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आजादी की जंग की चिंगारी को हवा देने वाले बिरसा मुंडा को नहीं जानती आज की पीढ़ी

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आज भारत के वासी जिस खुली हवा में सांस ले रहे हैं वो शायद ये भूल चुके हैं कि इसके लिए कितने लोगों की कुर्बानियां लगी हैं। कुछ लोगों को इस लड़ाई में नाम तो मिला लेकिन कई क्रांतिकारी ऐसे भी रहे जिनका नाम कहीं दर्ज तक नहीं है। मगर हमें उन लोगों का धन्यवाद करना चाहिए जिन्होंने देश में आजादी की चिंगारी को गांव गांव तक पहुंचाया। आज ऐसे ही आजादी के एक दीवाने बिरसा मुंडा के बारे में जानेंगे जिन्हें लोगों ने भगवान का दर्जा दिया।

रांची में हुआ जन्म

रांची में हुआ जन्म

15 नवंबर 1857 को रांची जिले के उलिहतु गांव में बिरसा मुंडा का जन्म हुआ। वो एक आदिवासी नेता और लोकनायक के तौर पर मशहूर हुए। इतना ही नहीं, सिंहभूमि के लोग इन्हें बिरसा भगवान कहकर आज भी याद करते हैं। बिरसा मुंडाने गरीबी का दौर और साथ ही अंग्रेजों का जुल्म दोनों को अपनी आंखों से देखा। बिरसा पढ़ाई में काफी अच्छे थे इन्हें इनके मामा के यहां भेज दिया गया जहां वो दो साल तक रहे। पढ़ाई में इनकी लगन देखकर स्कूल चलाने वाले जयपाल नाग जयपाल नाग ने इन्हें जर्मन मिशन स्कूल में दाखिला लेने की सलाह दी। मगर उस वक्त किसी क्रिस्चियन स्कूल में प्रवेश पाने के लिए बच्चे को ईसाई धर्म अपनाना जरुरी होता था। बिरसा ने भी धर्म परिवर्तन कर अपना नाम बिरसा डेविड रखा और बाद वो बिरसा दाउद हो गया।

चेचक की महामारी में की सेवा

चेचक की महामारी में की सेवा

1895 के दौरान बिरसा के इलाके में चेचक की बीमारी फैल गई। ऐसे कष्टमय समय में बिरसा ने जमकर लोगों की सेवा की। उनकी सेवा और सहयोग से कई लोग इस बिमारी से स्वस्थ भी होने लगे। इस वजह से लोगों के मन में बिरसा को लेकर सम्मान और अधिक बढ़ गया। लोग उन्हें भगवान का अवतार मानने लगें। लोगों के मन में ये विश्वास पैदा हो गया कि बिरसा के स्पर्श कर देने से ही व्यक्ति रोगमुक्त हो जाता है।

अंग्रेजों के खिलाफ हुए जंग में शामिल

अंग्रेजों के खिलाफ हुए जंग में शामिल

1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेजी सिपाहियों के बीच जंग चलती रही। अगस्त 1897 में बिरसा और तीर कमानों से लैस उनके चार सौ सिपाहियों ने खूंटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे अंग्रेज सेनाओं से हुई भिड़ंत में अंग्रेजी सेना को हार माननी पड़ी। मगर इसका खामियाजा उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ़्तारियों के तौर पर भुगतना पड़ा।

जनवरी 1900 में डोमबाड़ी पहाड़ी हुए संघर्ष में कई औरतें और बच्चे मारे गये। उस स्थान पर बिरसा अपनी जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे। 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर में बिरसा को गिरफ़्तार कर लिया गया।

बिरसा के जीवन के आखिरी दिन जेल में ही बीते। उन्होंने अपनी अंतिम सांसें 9 जून 1900 को रांची कारागार में ली। यहां रहस्यमयी तरीके से उनकी मौत हो गई। दरअसल अंग्रेजों ने उनकी मौत का कारण हैजा बताया लेकिन उनके शरीर में हैजा का कोई लक्षण नहीं मिला।

English summary

Birsa Munda: Story of Fearless Tribal Freedom Fighter

Story of Freedom Fighter Birsa Munda.