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Tirupati Laddu को मिल चुका है GI टैग, 309 साल पुराना है इस 'प्रसादम' का इतिहास, जानें खासियत
Tirupati Laddu Controversy: विश्व प्रसिद्ध आंध्र प्रदेश स्थित भगवान वेंकटेश्वर के तिरूपति मंदिर में भक्तों के बीच बंटने वाला भगवान तिरूपति का "वारी लड्डू या प्रसादम" देश ही नहीं बल्कि अपने अनोखे स्वाद और आस्था की वजह दुनियाभर में फेमस हैं। एक बार फिर भगवान का यह प्रसादम सुर्खियों में है। लेकिन इस बार वजह कुछ और है।
राज्य के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने गुजरात लैब की रिपोर्ट साझा करते हुए खुलासा किया है कि पिछली YSRCP सरकार में तिरुपति के पवित्र लड्डू में घी की जगह पशु की चर्बी का इस्तेमाल किया गया। हालांकि अब तिरुपति प्रसादम में शुद्ध घी का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके बाद से इस पवित्र लड्डू की शुद्धता को लेकर विवाद छिड़ गया है।
इसी बीच जानते हैं कि आखिर कौन और कैसे तैयार इन लड्डुओं को तैयार करता है? साथ ही जानते हैं इसका इतिहास क्या है?

तिरुपति लड्डू का इतिहास
तिरुपति लड्डू के वारी लड्डू की शुरुआत 309 साल पहले हुई थी। एक लोककथा के अनुसार एक बार, भगवान वेंकटेश्वर भगवान विष्णु के भक्तों की शादी के लिए धन का संचय करने के लिए पृथ्वी पर आए थे। इस दौरान, स्थानीय एक महिला ने उन्हें चावल का आटा और गुड़ मिलाकर बनायी गयी एक स्वादिष्ट मिठाई बनाकर खिलाई। उनकी इस श्रद्धा से खुश हो भगवान वेंकटेश्वर ने महिला से कहा कि उसे मंदिर में शाश्वत भेंट मिलेगी। इस प्रकार, भगवान वेंकटेश्वर को प्रसाद के रूप में लड्डू भोग में लगाए जाने की परंपरा की शुरुआत हुई जो आज भी जारी है। लेकिन शुरुआत में लड्डू का ऐसा स्वरूप नहीं था, जैसा अभी है। इनमें कई बार बदलाव हो चुका हैं।
कैसे बनता है मंदिर का प्रसादम
तिरुपति बालाजी के मंदिर में मिलने वाले प्रसाद को तिरु लड्डू, प्रसादम और वारी लड्डू के नाम से जाना जाता है। तिरुपति मंदिर में प्रसादम बनाने के तरीके को दित्तम (Dittam) कहा जाता है। दरअसल ये लड्डू को बनाने की सामग्री और उसके अनुपात की सूची होती है। तिरु लड्डू के 200 सालों के इतिहास में दित्तम में अब तक के इतिहास में सिर्फ 6 बार बदलाव किया गया है।
मौजूदा समय में प्रसाद में बेसन, काजू, इलायची, घी, चीनी, मिश्री और किशमिश मिलाया जाता है। हर रोज प्रसाद तैयार करने के लिए 10 टन बेसन, 10 टन चीनी, 700 किलोग्राम काजू, 150 किलोग्राम इलायची, 300 से 400 लीटर घी, 500 किलोग्राम मिश्री और 540 किलोग्राम किशमिश का इस्तेमाल होता है।
रोजाना होता है 800 लड्डू का इस्तेमाल
तिरुपति मंदिर में ये चढाए जाने वाले इस लड्डू को तिरु लड्डू या प्रसादम भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस प्रसाद के बिना बालाजी के दर्शन अधूरे हैं। मंदिर में ये लड्डू का प्रसाद बनाने का खास तरीका ही इस प्रसादम को सबसे अलग बनाता है। मंदिर में लड्डू निर्माण के समय पूरी शुद्धता का ध्यान रखा जाता है। तिरुपति मंदिर में इस प्रसादम को बनाने के लिए एक खास रसोईघर है, जिसे लड्डू पोटू कहा जाता है। जहां पर लड्डू तैयार किए जाते हैं। लड्डू बनाने के तरीको में भी बदलावा आया है जहां पहले पुराने तरीके से प्रसादम बनाने के लिए लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता था, वहीं 1984 के बाद से इसके लिए एलपीजी गैस का इस्तेमाल होने लगा है। जानकारी के मुताबिक लड्डू पोटू में रोजाना 8 लाख लड्डूओं का निर्माण किया जाता है।
2008 में मिल चुका है जीआई टैग
तिरुपति लड्डू की कालाबाजारी रोकने के लिए 2008 में तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम ने जीआई टैग के लिए पंजीकरण कराया था। 2009 में इसने जीआई अधिनियम 1999 के तहत खाद्य पदार्थों की श्रेणी के तहत तिरुपति लड्डू के लिए पेटेंट अधिकार प्राप्त मिला था।
इन लड्डूओं से जुडे फैक्ट
- साल 2015 में सर्वाधिक 1.8 मिलियन वारी लड्डू बेचे गये थे जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।
- तिरुपति मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर को चढ़ाया जाने वाला लड्डू पहली बार 2 अगस्त 1715 को भक्तों में वितरित किया गया था।
- मंदिर में वितरित होने वाला 300 ग्राम लड्डू की कीमत करीब ₹25 होती है लेकिन तिरुपति तिरुमाला मंदिर प्रशासन (TTD) इसे कई बार भक्तों को ₹10 प्रति पीस की दर से भी देती है।



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