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क्या आप जानते हैं उत्तराखंड में कहां-कहां लगता है उतरायणी का मेला? जहां होता है संस्कृति और आस्था का संगम
Utarayani Mela Uttarakhand: आज मकर संक्रांति है और हर साल इस मौके पर उत्तराखंड की धरती लोक आस्था, संस्कृति और परंपराओं से सराबोर हो जाती है। आज घुघुतिया का त्योहार बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाएगा जिसे उत्तराखंड में उतरायणी भी कहा जाता है। इसी अवसर पर कुमाऊं में लगने वाला उतरायणी का मेला न सिर्फ धार्मिक आयोजन है, बल्कि यह लोक संस्कृति, व्यापार, लोकगीत और सामाजिक मेल-मिलाप का भी बड़ा उत्सव होता है। सूर्य के उत्तरायण होने के साथ ही शुरू होने वाला यह मेला सदियों से कुमाऊं की पहचान बना हुआ है।
खास बात यह है कि उतरायणी का मेला केवल एक जगह नहीं, बल्कि कुमाऊं के कई प्रमुख तीर्थ और कस्बों में अलग-अलग रूप में आयोजित किया जाता है। आइए जानते हैं बागेश्वर से लेकर हल्द्वानी तक किन-किन जगहों पर उतरायणी का मेला लगता है और क्या है इन स्थानों की खासियत।
1. बागेश्वर (Bageshwar)
बागेश्वर उतरायणी मेले का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध केंद्र माना जाता है। यह मेला बागनाथ मंदिर परिसर में सरयू और गोमती नदियों के पावन संगम पर लगता है। दूर-दराज के गांवों से लोग यहां गंगा स्नान की तरह सरयू स्नान के लिए पहुंचते हैं। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ यहां विशाल व्यापारिक मेला भी लगता है, जहां स्थानीय हस्तशिल्प, ऊनी वस्त्र और पारंपरिक सामान बिकते हैं।

2. रानीबाग (Ranibagh)
नैनीताल के पास स्थित चित्रशिला क्षेत्र, जिसे रानीबाग भी कहा जाता है, उतरायणी मेले का एक प्रमुख स्थल है। यहां कोसी नदी के तट पर श्रद्धालु स्नान कर सूर्य देव की पूजा करते हैं। यह मेला स्थानीय लोगों के लिए आस्था और मेल-जोल का बड़ा अवसर माना जाता है।
3. रामेश्वर (Rameshwar)
रामेश्वर भी उतरायणी मेले का एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। यहां मकर संक्रांति के दिन श्रद्धालु पवित्र स्नान और पूजा-पाठ करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के लोग पारंपरिक परिधान पहनकर मेले में शामिल होते हैं, जिससे यहां का माहौल पूरी तरह लोक रंग में रंग जाता है।
4. सुल्ट महादेव (Sult Mahadev)
अल्मोड़ा जनपद में स्थित सुल्ट महादेव मंदिर क्षेत्र में भी उतरायणी का मेला बड़े उत्साह से मनाया जाता है। यह स्थान धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी जाना जाता है। यहां लगने वाला मेला स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को जीवंत बनाए रखता है।
5. हंसेश्वर (Hanseshwar)
हंसेश्वर में लगने वाला उतरायणी मेला भले ही छोटा हो, लेकिन इसका सांस्कृतिक महत्व बहुत बड़ा है। यहां गांवों के लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, पारंपरिक गीत-संगीत होता है और लोक परंपराओं का प्रदर्शन देखने को मिलता है। मेले में कुंमाऊं के खाद्य पदार्थ भी मिलते हैं।
6. हल्द्वानी (Haldwani)
कुमाऊं के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले हल्द्वानी में उतरायणी के मौके पर बड़ा जुलूस और मेला लगता है। शहर में सांस्कृतिक कार्यक्रम, लोक नृत्य और पारंपरिक व्यंजन इस उत्सव को खास बनाते हैं। यहां का मेला आधुनिकता और परंपरा का सुंदर संगम माना जाता है।
इस तरह उतरायणी का मेला उत्तराखंड में केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कुमाऊं की लोक विरासत, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है, जहां आस्था और संस्कृति एक साथ नजर आती है।



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