Latest Updates
-
क्या आपने कभी खाया है 'हरामजादा' और 'गधा' आम? मिलिए Mango की उन 14 किस्मों से जिनके नाम हैं सबसे अतरंगी -
Mother's Day 2026 Wishes for Bua & Mausi: मां जैसा प्यार देने वाली बुआ और मौसी को भेजें मदर्स डे पर ये संदेश -
Periods Delay Pills: पीरियड्स टालने वाली गोलियां बन सकती हैं जानलेवा, इस्तेमाल से पहले जान लें ये गंभीर खतरे -
वजन घटाने के लिए रोज 10K कदम चलना सबसे खतरनाक, एक्सपर्ट ने बताए चौंकाने वाले दुष्परिणाम -
Maharana Pratap Jayanti 2026 Quotes: महाराणा प्रताप की जयंती पर शेयर करें उनके अनमोल विचार, जगाएं जोश -
Shani Gochar 2026: रेवती नक्षत्र में शनि का महागोचर, मिथुन और सिंह सहित इन 5 राशियों की लगेगी लॉटरी -
Aaj Ka Rashifal 9 May 2026: शनिवार को इन 4 राशियों पर बरसेगी शनिदेव की कृपा, धन लाभ के साथ चमकेंगे सितारे -
Mother Day 2026: सलाम है इस मां के जज्बे को! पार्किंसंस के बावजूद रोज 100 लोगों को कराती हैं भोजन -
Aaj Ka Rashifal 08 May 2026: शुक्रवार को इन 4 राशियों पर बरसेगी मां लक्ष्मी की कृपा, जानें अपना भाग्यशाली अंक और रंग -
Mother’s Day 2026: इस मदर्स डे मां को दें स्टाइल और खूबसूरती का तोहफा, ये ट्रेंडी साड़ियां जीत लेंगी उनका दिल
बसंत पंचमी पर क्यों सजाई जाती है हजरत निजामुद्दीन दरगाह? जानें 700 साल पुरानी परंपरा
Basant Panchami at Nizamuddin Dargah: आज 23 जनवरी को बसंत पंचमी का त्योहार देशभर में बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा है। जब पूरी दुनिया बसंत पंचमी पर विद्या की देवी मां सरस्वती की वंदना कर रही होती है, ठीक उसी समय दिल्ली की गलियों से एक पीला कारवां निकलता है। हाथों में सरसों के फूल, सिर पर पीली टोपियां और होंठों पर अमीर खुसरो की कव्वाली... यह नजारा किसी मंदिर का नहीं, बल्कि मशहूर सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह का है।
शायद आपको जानकर हैरानी हो, लेकिन इस दरगाह पर पिछले 700 सालों से बसंत पंचमी का त्योहार उसी उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। आखिर एक मुस्लिम सूफी संत की चौखट पर 'बसंत' कैसे और क्यों उतरी? इसके पीछे अमीर खुसरो के अपने गुरु के प्रति अटूट प्रेम की एक ऐसी कहानी है, जो आज भी हर मजहबी दीवार को गिरा देती है।

गुरु का गम और शिष्य की तरकीब जानें कैसे शुरू हुई ये परंपरा?
इस 700 साल पुरानी परंपरा की नींव महान कवि और संगीतकार अमीर खुसरो ने रखी थी। इतिहास के अनुसार, हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने युवा भतीजे के निधन के बाद गहरे शोक में डूब गए थे। वे कई महीनों तक उदास रहे और उन्होंने लोगों से मिलना-जुलना भी बंद कर दिया। अपने गुरु (पीर) को इस तरह गमगीन देख अमीर खुसरो का दिल बैठ गया। वे उन्हें खुश करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे थे।
जब खुसरो ने ओढ़ा 'बसंती' चोला
एक दिन अमीर खुसरो ने देखा कि कुछ हिंदू महिलाएं पीले वस्त्र पहनकर, हाथों में सरसों के फूल लिए और गीत गाती हुई जा रही हैं। जब उन्होंने पूछा, तो पता चला कि वे 'बसंत' मना रही हैं और अपने आराध्य को खुश करने के लिए फूल चढ़ाने जा रही हैं। खुसरो को अपने गुरु को हंसाने की एक तरकीब सूझी। उन्होंने फौरन पीला चोला पहना, सिर पर पीली पगड़ी बांधी और सरसों के फूलों का गुच्छा लेकर अपने गुरु के पास पहुँच गए। वे नाचने लगे और बसंत के गीत गाने लगे। अपने प्रिय शिष्य का यह अनोखा और प्रेम भरा रूप देखकर हजरत निजामुद्दीन औलिया मुस्कुरा उठे। तभी से इस दरगाह पर 'सूफी बसंत' मनाने की शुरुआत हुई।
आज भी ऐसे जीवंत होती है 700 साल पुरानी याद
आज भी हर साल बसंत पंचमी के दिन दरगाह का नजारा पूरी तरह 'बसंती' हो जाता है- दरगाह के खादिम और कव्वाल हजरत निजामुद्दीन और अमीर खुसरो की मजार पर सरसों के फूल और पीली चादर चढ़ाते हैं। दरगाह के आंगन में वही गीत गाए जाते हैं जो खुसरो ने उस दिन गाए थे, जैसे- "आज बसंत मना ले सुहागन" और "सकल बन फूल रही सरसों"। बता दें कि इस उत्सव में केवल मुसलमान ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में हिंदू और अन्य धर्मों के लोग भी पीले कपड़े पहनकर हिस्सा लेते हैं।

सूफियाना मोहब्बत का प्रतीक
सूफी परंपरा में पीला रंग अब केवल एक मौसम का प्रतीक नहीं, बल्कि वैराग्य और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का रंग बन गया है। निजामुद्दीन दरगाह की यह परंपरा दुनिया को संदेश देती है कि प्रेम का कोई धर्म नहीं होता और खुशियां साझा करने के लिए किसी सरहद की जरूरत नहीं होती।



Click it and Unblock the Notifications