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रिसर्च: डायपर में मौजूद टॉक्सिक केमिकल बिगाड़ सकती है बच्चें की सेहत, ग्रोथ में बन सकती है रुकावट
जब एक शिशु जन्म लेता है, तभी से माता-पिता नवजात को डायपर लगाना शुरू कर देते हैं और यह डायपर लगाने का सिलसिला एक से दो साल तक यूं ही चलता रहता है। इस बात में कोई दोराय नहीं है कि बेबी को डायपर पहनाना अधिक सुविधाजनक है और इसे पहनाने के बाद लंबे समय तक बच्चे को मैनेज किया जा सकता है। लेकिन बहुत कम पैरेंट्स को इस बात की जानकारी होगी कि इन डायपर का अधिक इस्तेमाल बच्चे की सेहत पर विपरीत प्रभाव डाल सकते हैं। दरअसल, इन्हें बनाते समय कई तरह के केमिकल्स का इस्तेमाल किया जाता है और जब बच्चा इनके संपर्क में आता है, तो इससे उसकी स्किन भी इसका असर पड़ता है। तो चलिए आज इस लेख में हम डायपर में इस्तेमाल किए जाने वाले केमिकल्स और उनके हानिकारक प्रभावों के बारे में बात कर रहे हैं-

परीक्षण में आया सामने
अधिकतर पैरेंट्स डिस्पोजेबल डायपर खरीदना पसंद कतरते हैं, लेकिन इनमें केमिकल्स का बहुत अधिक इस्तेमाल किया जाता है। फ्रांस की ANSES नामक एक एजेंसी ने डिस्पोजेबल डायपर के सबसे अधिक बिकने वाले ब्रांडों का परीक्षण किया और पूरे यूरोप में बिकने वाले कई ब्रांड्स के डायपर में "बहुत गंभीर व खतरनाक" रसायन पाए गए। अधिकांश रसायन हार्मोन को बाधित करते हैं, जिसका अर्थ है कि उन्हें बेबी के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता है।
हालांकि, इससे पहले भारत में इन डायपर को लेकर परीक्षण किया जा चुका है। साल दिल्ली बेस्ड एक आर्गेनाइजेशन ने कई ब्रांडेड डिस्पोजेबल डायपर को लेकर एक अध्ययन किया और यह पाया गया कि इसमें थैलेट्स पाए जाते हैं, जो बच्चे की हेल्थ पर गंभीर विपरीत प्रभाव छोड़ सकते हैं। इस अध्ययन के लिए 19 ब्रांड्स के 20 सैंपल की लैबोरेटरी में जांच की गई। जांच के दौरान डायपर में 2.36 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) से लेकर 302.25 पीपीएम तक थैलेट्स की मात्रा पाई गई, जो यकीनन एक चिंता का विषय है। कई बेबी प्रोडक्ट्स में इसका उपयोग करना प्रतिबंधित है। इसके बावजूद डायपर में इतनी अधिक मात्रा में इसका होना खतरनाक है।

रसायनों का होता है हानिकारक प्रभाव
डायपर बनाते समय कई केमिकल्स का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें थैलेट्स प्रमुख है। यह एक ऐसा रसायन है, जो नमी पाकर डायपर से मुक्त हो जाता है और फिर बच्चे की स्किन से इसका संपर्क होता है। जब यह लगातार स्किन के संपर्क में रहता है तो इससे बच्चे को कैंसर से लेकर किडनी की समस्याएं, अंतःस्रावी (हार्मोन) में व्यवधान, रिप्रोटॉक्सिक प्रभाव (प्रजनन क्षमता को प्रभावित करना) फर्टिलिटी इश्यूज़, न्यूरो डेवलपमेंट इश्यू, मेटाबॉलिक डिसऑर्डर, डायबिटीज़ और ऑटिज़्म जैसी कई तरह की बीमारियां होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी यह माना है कि बच्चे विशेष रूप से रसायनों के प्रति संवेदनशील होते हैं। इसलिए, उन्हें किसी भी तरह के केमिकल में कम से कम संपर्क में लाने की कोशिश करनी चाहिए।

डायपर के अन्य नुकसान
डायपर में इस्तेमाल किए जाने वाले केमिकल्स तो बच्चों को नुकसान पहुंचाते ही हैं। साथ ही साथ इससे अन्य भी कई नुकसान होते हैं। मसलन-
• डायपर एलर्जी का कारण बन सकता है। कुछ डायपर बनाने वाली कंपनियां अक्सर डायपर बनाने में सिंथेटिक फाइबर, डाई या अन्य कठोर रासायनिक उत्पादों का उपयोग करती हैं। जो बच्चे की संवेदनशील त्वचा पर एलर्जी का कारण बन सकते हैं।
• डायपर का अधिक इस्तेमाल शिशुओं में डायपर रैशेज की वजह भी बन सकता है। गीले गंदे डायपर में बैक्टीरिया पैदा हो सकते हैं और इससे रैशेज हो सकते हैं।
• डायपर एक ऐसी सामग्री से बने होते हैं जो आपके बच्चे के मूत्र को अवशोषित करने की अनुमति देती है। वह बच्चे के डायपर के अंदर हवा के आसान प्रवाह में बाधा डाल सकता है, जिससे बैक्टीरिया और अन्य कीटाणुओं पनपने लगते हैं। जिससे बच्चे को इंफेक्शन होने की संभावना भी बनी रहती है।
• जो बच्चे अधिकतर समय डायपर पहनते हैं, उन्हें टॉयलेट- ट्रेनिंग में भी समस्या होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शिशुओं को डायपर में पेशाब करने और शौच करने की आदत हो जाती है। ऐसे में जब पैरेंट्स बच्चे को पॉटी ट्रेनिंग देने की कोशिश करते हैं, तो इससे समस्या होती है।



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