Latest Updates
-
प्रेग्नेंट हैं 39 साल की सामंथा रुथ प्रभु! करीबी शख्स ने किया कन्फर्म, जानें कब होगी डिलीवरी -
मलाइका अरोड़ा की फिटनेस का खुल गया राज, 52 की उम्र में यंग दिखने के लिए करती हैं ये 5 योगासन -
South Indian Style Tomato Rice Recipe: घर पर बनाएं रेस्टोरेंट जैसा चटपटा स्वाद -
Summer Solstice: 21 जून को क्यों होता है साल का सबसे बड़ा दिन? जानें क्या है इसके पीछे की असली वजह -
International Yoga Day 2026 Wishes: योग करे जो रोज...योग दिवस पर प्रियजनों को भेजें ये खास शुभकामनाएं -
Father's Day 2026 Shayari: उंगली पकड़कर चलना सिखाया...फादर्स डे पर पापा को भेजें ये दिल छू लेने वाली शायरियां -
Zero Oil Sprouts Cheela Recipe: वजन घटाने के लिए बनाएं हेल्दी और टेस्टी नाश्ता -
50+ Father's Day 2026 Wishes: जिसके सिर पर पिता का हाथ...फादर्स डे पर पापा को भेजें ये दिल छू लेने वाले मैसेज -
Aaj Ka Rashifal 21 June 2026: रविवार को इन 5 राशियों पर होगी धन वर्षा, सूर्य देव बदलेंगे आपका भाग्य -
Fried Onion Special Egg Do Pyaza Recipe: घर पर बनाएं रेस्टोरेंट जैसा लाजवाब स्वाद
बच्चों में सामने आ रहे हैं अल्जाइमर के लक्षण, हो सकता है जानलेवा

हाल ही में मस्तिष्क से जुड़ी एक नयी बीमारी का खुलासा हुआ है जिसे नी मैन पिक-टाइप-1 डिजीज कहते हैं। यह बीमारी लोगों को बहुत अचंभित कर रही है क्योंकि छोटे बच्चों में इसके लक्षण अल्जाइमर से मिलते जुलते हैं। अल्जाइमर एक मानसिक बीमारी है जो धीरे धीरे लेकिन लगातार बढ़ती है।
इस बीमारी में दिमाग की कोशिकाओं का एकदूसरे से जुड़ाव कमज़ोर हो जाता है। इतना ही नहीं कोशिकाएं स्वयं कमज़ोर हो जाती है जिसके कारण व्यक्ति की याददाश्त कमज़ोर हो जाती है और वह दिमागी काम करने में सक्षम नहीं रह जाता है।
नी मैन पिक-टाइप-1 डिजीज पर भी कई अध्ययन किये गए हैं। हर बार की तरह हम आपके लिए नई जानकारी लेकर आए हैं। जी हाँ, इस आर्टिकल में हम आपको नी मैन पिक-टाइप-1 बीमारी से जुड़ी सभी जानकारियां देंगे। तो चलिए जानते हैं इस बीमारी के बारे में।

नी मैन पिक-टाइप-1 डिजीज क्या है?
नी मैन पिक-टाइप-1 एक जेनेटिक और न्यूरोडीजेनेरेटिव डिजीज है। हमारे सेल्स में अलग से एक थैली पायी जाती है जिसे लाइसोसोम कहते हैं जिसका काम कोलेस्ट्रॉल और शुगर को तोड़कर एक सरल रूप देकर हमारे शरीर के लिए तैयार करना होता है। जब लाइसोसोम अपना कार्य नहीं करता है तो पोषक तत्व सेल्स को इकठ्ठा करते हैं। अंत में कोलेस्ट्रॉल और दूसरे फैटी पदार्थ शरीर के विभिन्न हिस्सों में बनने लगते हैं, शरीर के इन हिस्सों में ब्रेन भी शामिल होता है जिसके परिणामस्वरूप संज्ञानात्मक गिरावट आती है।
नी मैन पिक-टाइप-1 डिजीज पांच महीने के शिशु से लेकर पंद्रह साल तक के बच्चों को हो सकता है।
जैसे जैसे यह रोग बढ़ता है बच्चों में इसके लक्षण अलग अलग रूप में दिखाई पड़ते हैं। यही कारण है कि इस बीमारी का पता शुरआती दौर में लगाना थोड़ा मुश्किल होता है।

इसे बचपन का अल्जाइमर क्यों कहते हैं?
हालांकि नी मैन पिक-टाइप-1 डिजीज और अल्जाइमर दोनों ही अलग होते हैं ख़ास तौर पर जब कारणों की बात आती है। फिर भी दोनों में बहुत सारी सामानताएं हैं। शुरुआत के लिए दोनों ही डिजीज जेनेटिक और न्यूरोडीजेनेरेटिव हैं। ब्रेन सेल्स के बिगड़ने के परिणामस्वरूप संज्ञानात्मक गिरावट आती है यही वजह है जो इसे बचपन का अल्जाइमर कहा जाता है।

बचपन में अल्जाइमर का कारण क्या होता है?
95 प्रतिशत से ऊपर के मामलों में बच्चों को अल्जाइमर जेनेटिक म्युटेशन के कारण होता है। यह माता या पिता किसी से भी हो सकता है। दो विशेष जीन्स डिजीज से NPC1 और NPC2 से प्रभावित होते हैं। इन जीन्स को कोशिकाओं के अंदर तक महत्वपूर्ण कार्यों को करने के लिए जाना जाता है।
जब यह जीन्स उत्परिवर्तित होते हैं। सेल ऑर्गन्स का कार्य विशेष रूप से लाइसोसोम प्रभावित होता है जिसके कारण ये कोलेस्ट्रॉल और अन्य फैटी एसिड्स का संश्लेषण ठीक तरह से नहीं कर पाते। इसके परिणामस्वरूप इस तरह के पदार्थ शरीर के अलग अलग हिस्सों में इकट्ठे हो जाते हैं जो बचपन में अल्जाइमर को बढ़ाते हैं।

बचपन में अल्जाइमर का पता कैसे लगाया जा सकता है?
यदि बच्चा इससे प्रभावित है तो इसके मुख्य लक्षण बढ़ा हुआ स्प्लीन और लिवर है जहाँ शुरू में भारी मात्रा में कोलेस्ट्रॉल जम जाता है। नीमैन पिक-टाइप-1 डिजीज की शुरुआत के सामान्य संकेतों में हाथों और आखों में संतुलन ना होना, अस्थिर चाल, निगलने में परेशानी है। ध्यान रहे यदि आपके परिवार में इसका कोई इतिहास हो या फिर किसी अनुवांशिक स्थिति रही है तो इस बारे में अपने डॉक्टर को ज़रूर बताएं।
यह स्थिति बहुत ही दुर्लभ होती है इसलिए इसका पता लगाना थोड़ा मुशिकल हो जाता है। यही वजह है कि डॉक्टर्स लिवर सेल्स की बायोप्सी का सहारा लेते हैं। इससे लिवर में जमे कोलेस्ट्रॉल की सही मात्रा का खुलासा हो जाता है। इसके अलावा जेनेटिक टेस्टिंग भी एक अच्छा विकल्प माना जाता है।

बचपन में अल्जाइमर का इलाज कैसे किया जा सकता है?
यह बहुत ही दुखद बात है कि बचपन में अल्जाइमर का इलाज पूरी तरह से संभव नहीं होता क्योंकि यह एक जेनेटिक स्थिति होती है। आमतौर पर इस बीमारी से जूझने वाले बच्चे ज़्यादा से ज़्यादा दस या पंद्रह साल तक ही जीवित रह पाते हैं या फिर इससे थोड़ा और ज़्यादा। बच्चों का जीवित रहना इस बात पर निर्भर करता है कि वह इस स्थिति से कितना और कैसे निपटता है।
ये स्थिति बिल्कुल नयी है इसलिए अल्जाइमरऔर इसके इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाइयां लगभग मिलती जुलती हैं। हालांकि ज़्यादातर दवाइयों को सरकार द्वारा मंज़ूरी नहीं दी गयी है।
इस स्थिति को संभालने के लिए स्टैण्डर्ड थेरेपी का सहारा लिया जा सकता है हालांकि बच्चों की हर परेशानी के लिए थेरेपी आसान नहीं होती। सभी पेरेंट्स से हमारी यही गुज़ारिश रहेगी कि भविष्य में ऐसी परेशानी न हो इसके लिए आप पहले ही जेनेटिक टेस्टिंग करा लें तो बेहतर होगा।



Click it and Unblock the Notifications