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Navratri व्रत के दौरान संभोग करना सही या गलत? पढ़ें धार्मिक और वैज्ञानिक तर्क
Navratri Vrat Rules For Married Couples: नवरात्रि (Navratri 2026) केवल नौ दिनों तक उपवास रखने या देवी की मूर्तियों के सामने दीप प्रज्वलित करने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह तन, मन और आत्मा की शुद्धि का एक अनुष्ठान है। आज से यानी 19 मार्च 2026 से चैत्र नवरात्रि शुरू हो गए हैं और माता के भक्तों ने उन्हें प्रसन्न करने के लिए उपवास रखा है। हिंदू धर्म में नवरात्रि को साधना काल माना गया है, जिसमें साधक अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण पाकर ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ने का प्रयास करता है। इन पावन दिनों में खान-पान के कड़े नियमों जैसे तामसिक भोजन का त्याग के साथ-साथ 'ब्रह्मचर्य' (Celibacy) के पालन को भी अनिवार्य बताया गया है।
अक्सर गृहस्थ जीवन जी रहे जोड़ों के मन में यह जिज्ञासा या दुविधा रहती है कि क्या नवरात्रि व्रत के दौरान शारीरिक संबंध (संभोग) बनाना वर्जित है? शास्त्रों के अनुसार, उपवास का अर्थ केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि ईश्वर के निकट वास करना है। ऐसे में कामेच्छाओं पर नियंत्रण और ब्रह्मचर्य का पालन उस आध्यात्मिक मार्ग की पहली सीढ़ी मानी गई है। आइए जानते हैं, इस विषय पर धर्मग्रंथ क्या कहते हैं और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस दौरान संयम क्यों जरूरी है।

शास्त्रों में 'ब्रह्मचर्य' की महत्ता
देवी भागवत पुराण और अन्य ग्रंथों के अनुसार, नवरात्रि 'शक्ति' की उपासना का समय है। इस दौरान साधक को मानसिक और शारीरिक शुद्धता बनाए रखनी चाहिए। संभोग को एक सांसारिक और ऊर्जा व्यय करने वाली क्रिया माना गया है, जबकि नवरात्रि का उद्देश्य ऊर्जा को 'मूलाधार' से 'सहस्रार' चक्र की ओर ले जाना होता है। इसलिए, इन नौ दिनों में पति-पत्नी को एक-दूसरे के प्रति सम्मान रखते हुए शारीरिक दूरी बनाए रखने का निर्देश दिया गया है।
ऊर्जा का संरक्षण
आध्यात्मिक दृष्टि से, उपवास के दौरान शरीर में भोजन कम होने से ऊर्जा का स्तर बदलता है। इस ऊर्जा का उपयोग मंत्रोच्चार, ध्यान और कीर्तन में करना चाहिए। शारीरिक संबंध बनाने से ओज (Vitality) का क्षय होता है, जिससे साधना की एकाग्रता भंग हो सकती है। व्रत की पूर्णता के लिए मन को विकारों से मुक्त रखना अनिवार्य है।
केवल शारीरिक ही नहीं, 'मानसिक' संयम भी जरूरी
ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल शरीर से दूर रहना नहीं है, बल्कि विचारों की शुद्धता भी है। शास्त्रों के अनुसार, यदि मन में कामुक विचार आ रहे हैं, तो भी व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। नवरात्रि में देवी के नौ रूपों का ध्यान करते समय मन में सात्विकता और पवित्रता का भाव होना चाहिए।
वैज्ञानिक और शारीरिक कारण
वैज्ञानिक नजरिए से देखें तो उपवास के दौरान शरीर 'डिटॉक्सिफिकेशन' (शुद्धिकरण) की प्रक्रिया में होता है। इस समय शरीर की पूरी शक्ति पाचन तंत्र को आराम देने और आंतरिक मरम्मत में लगी होती है। भारी शारीरिक गतिविधि या संभोग शरीर पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है, जिससे थकान या कमजोरी महसूस हो सकती है।
क्या अनजाने में नियम टूटने पर व्रत खंडित होता है?
धर्म में 'भाव' सर्वोपरि है। यदि अनजाने में या अज्ञानतावश कोई भूल हो जाए, तो देवी मां से क्षमा याचना करनी चाहिए। हालांकि, जानबूझकर नियमों का उल्लंघन करना व्रत की मर्यादा के विरुद्ध माना जाता है। गृहस्थों के लिए सलाह दी जाती है कि वे इन नौ दिनों में अलग बिस्तर पर सोएं और सात्विक दिनचर्या का पालन करें।
मासिक धर्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। इस दौरान महिलाएं मानसिक जाप कर सकती हैं। ब्रह्मचर्य के नियम इस अवस्था में भी वही रहते हैं जो सामान्य दिनों में व्रत के दौरान होते हैं।
व्रत केवल शरीर का नहीं, मन का भी होता है। यदि मन में जानबूझकर कामुक विचार लाए जाएं, तो व्रत का आध्यात्मिक फल कम हो जाता है। ऐसे में तुरंत मां दुर्गा का ध्यान करना चाहिए और 'क्षमा प्रार्थना' करनी चाहिए।



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