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पहल: स्पेन में मेंटल हेल्थ के लिए बना 'क्राईंग रूम' , ताकि खुलकर निकाल सकें यहां मन की भड़ास
स्पेन में बढ़ते तनाव और डिप्रेशन कैसेज को देखते हुए यहां 'क्राइंग रूम' प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। मैड्रिड में बने इस क्राइंग रूम में मेंटल हेल्थ से जूझ रहा कोई भी व्यक्ति यहां आकर खुलकर चिल्ला और रो सकता है। इसके साथ ही वो इस डिप्रेशन से उबरने के लिए यहां मौजूद मनोचिकित्सक से मदद भी ले सकता है। हम बात कर रहे हैं स्पेन के 'ला लोरेरिया' या क्राईंग रूम की, एक ऐसी जगह जहां आप खुलकर अपना दुख व्यक्त कर सकते हैं, या दूसरे शब्दों में; एक ऐसी जगह जहां आप दिल खोलकर रो सकते हैं।

आत्महत्या है मरने का दूसरा कारण
स्पेन में क्राइंग रूम शुरू करने की बड़ी वजह है यहां बढ़ती आत्महत्याएं। साल 2019 में स्पेन में 3,671 लोगों ने आत्महत्या की। प्राकृतिक कारणों के बाद आत्महत्या मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण बनकर सामने आया है। स्पेन में हर 10 में से एक टीनएजर मेंटल हेल्थ से जूझ रहा है। यहां की 5.8 फीसदी आबादी एंग्जाइटी से जूझ रही है।

ला लोरेरिया यानी क्राइंग रुम
सैंट्रल मैड्रिड, स्पेन में स्थित, गुलाबी रंग के ला लोरेरिया या क्राइंग रूम में प्रवेश करते ही "एंटर एंड क्राई" या " आई टू हैव एंग्जायटी " जैसे साइन पढ़ने को मिलते हैं। ये दोनों साइन रोने और चिंता को एक दूसरे से कनेक्ट करने के संकेत देते हैं। यहां आने वाले यह महसूस कराया जाता है कि मानसिक स्वास्थ्य के इस लड़ाई में वे अकेले नहीं हैं।
कमरे के कोने में, एक फोन के साथ उन लोगों की सूची के नाम और नंबर है जिन्हें आगंतुक कॉल कर सकते हैं और अपनी मानसिक स्थिति के बारे में खुलकर बात कर सकते हैं। इसे बनाने का लक्ष्य है कि लोगों में मेंटल हेल्थ को लेकर जागरुक कर, उसका समाधान ढूंढना और मदद करना है। मानसिक स्वास्थ्य से पीड़ित लोगों को इससे निकालना ही क्राइंग रूम का उद्देश्य है।

इस पहल के पीछे क्या उद्देश्य है?
इस वर्ष, विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर स्पेन के प्रधान मंत्री पेड्रो सांचेज़ ने 100 मिलियन यूरो या 116 मिलियन डॉलर के मानसिक स्वास्थ्य अभियान की घोषणा की, जिसमें 24 घंटे की आत्महत्या हेल्पलाइन शामिल होगी और डिप्रेशन की समस्या को खत्म करने के लिए खुलकर बात करने के लिए कहा था।
लेकिन मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कलंक सिर्फ एक स्पेनिश मुद्दा नहीं है, बल्कि एक वैश्विक संकट है। WHO की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ही हर 20 में से एक भारतीय डिप्रेशन का शिकार है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि भारत में लगभग 38 मिलियन लोगों के साथ चिंता, सिज़ोफ्रेनिया और बाइपोलर डिसऑर्डर से सबसे अधिक प्रभावित देशों की सूची में सबसे आगे है।



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