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क्या हमारे कर्मों पर ही निर्भर करता है हमारा भाग्य?
हमने अपने कई लेखों में इस बात पर चर्चा की है कि भगवान नहीं बल्कि मनुष्य स्वयं ही अपनी किस्मत बनाता है। लेकिन हम ऐसा कैसे कर सकते हैं। अगर मनुष्य को अपने अनुसार हर काम करने दे दिया जाए तो उसका नतीजा आखिर क्या होगा। लोग सिर्फ अपने बारे में ही सोचेंगे यानी अपनी जेब भरेंगे और आगे बढ़ जाएंगे।
किसी भी दौड़ में कोई प्रथम आता है तो कोई दूसरे नंबर पर। यदि व्यक्ति को उसकी किस्मत लिखने का मौका दे दिया जाए तो पहले वह खुद को आगे रखेगा और दूसरों को पीछे।

आज हम इस लेख में मनुष्य के कर्मों के बारे में बात करेंगे। क्या वाकई में हमारे कर्म हमारी किस्मत बनाते या बिगाड़ते हैं।
कर्मों का खेल
यह सब कर्मों का खेल है। हम जो करते हैं केवल वही हमारे कर्म नहीं होते बल्कि हम जो सोचते हैं या जो कहते हैं वो सब हमारे कर्म ही होते हैं। कहते हैं इस संसार को हम जो भी देते हैं वह किसी न किसी रूप में वापस हमारे पास ही आता है। इस प्रकार हमारा कर्म ही हमारी किस्मत तय करता है। चूंकि हम वो हैं जो अपने कार्य से कर्म करते हैं इसलिए अपने भाग्य के ज़िम्मेदार भी हम खुद ही होते हैं।
यदि आप किसी को दर्द दे रहे हैं तो कल किसी न किसी रूप में वह आपको वापस ज़रूर मिलेगा। वहीं दूसरी ओर अगर आपकी वजह से किसी को ख़ुशी मिलती है तो एक न एक दिन आपके जीवन में भी खुशियां ज़रूर आएंगी। यह ऊर्जा के रूप में एक से दूसरी जगह अपने लक्ष्य तक पहुंच ही जाता है।
जीवन में अनपेक्षित घटनाएं अतीत के कर्मों का परिणाम
क्या आपने कभी सोचा है कि क्यों आपके पास अचानक कोई इंसान आता है और आपसे झगड़ने लगता है या फिर आपने इस बात पर कभी गौर किया है कि क्यों आप किसी को बहुत पसंद करते हैं और किसी को नापसंद। यह कर्म होता है किसी के कारण किसी को दुःख पहुंचता है तो उसे भी वैसी ही तकलीफ से गुज़रना पड़ता है चाहे उसी दिन या फिर किसी और दिन। व्यक्ति का प्रेम या घृणा हम तक किसी भी रूप में पहुंच ही जाता है इसलिए कहा जाता है कि आज हम जिसे प्रेम करते हैं वह कल बदले में हमे भी प्रेम ज़रूर करेगा। इसे कहते हैं भाग्य के रूप में कर्म। जब हमारे कर्मों का फल मिलने में बहुत समय लगता है यानी हमने अपने किए हुए कार्यों का फल अपने अगले जन्म में मिलता है तो हमें कुछ भी याद नहीं रहता इसलिए हमारे अंदर एक सवाल उठता है कि आखिर मैं क्यों?
द्रौपदी का श्री कृष्ण से सवाल
महाभारत में जब कौरवों द्वारा द्रौपदी का अपमान किया गया था तब वह श्री कृष्ण के पास पहुंची और उनसे पूछा कि इस जघन्य अपराध के लिए उसे ही क्यों चुना गया। द्रौपदी ने कहा कि क्या यह सब उसके पिछले जन्म के कर्मों का फल है कि भरी सभा में उसके साथ इस प्रकार का अभद्र व्यवहार किया गया।
इस पर श्री कृष्ण ने एक बहुत ही सुन्दर उत्तर दिया। यह उसके पिछले जन्म के कर्मों का फल नहीं बल्कि कौरवों के बुरे कर्मों का फल है जो वे इस तरह के पाप का हिस्सा बनें।
विचारों से कर्म
बिल्कुल यही विचारों के लिए भी लागू होता है। यदि आप किसी व्यक्ति को मन में कोसेंगे और बाहर से उसके साथ अच्छा व्यवहार का दिखावा करेंगे तो ऐसे में आप से कुछ नकारात्मक ऊर्जा सामने वाले तक ज़रूर पहुंचेगी और इस तरह वह आपको नापसंद करने लगता है। चाहे वह आशीर्वाद हो या फिर श्राप वो अपने लक्ष्य तक पहुंच ही जाता है।
इसलिए विचारों के माध्यम से होने वाले पाप भी पाप ही कहलाते हैं। हम दो तरह की सोच रखते हैं एक अच्छा और दूसरा बुरा। कई बार हमें अपने अच्छे बुरे कर्मों का फल जल्द ही मिल जाता है। तो कई बार इसमें जन्मों लग जाते हैं। उदाहरण के तौर पर अगर हम किसी के घर गए और वह इंसान हमसे ठीक से व्यवहार नहीं करता तो ऐसे में हम सोचने लगते हैं कि इसमें हमारी कोई गलती नहीं है। हमें लगने लगता है जो कुछ भी हो रहा है वह ईश्वर की मर्ज़ी से हो रहा है लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि एक पिता अपने बच्चों को कभी कष्ट नहीं पहुंचा सकता।
यह सब हमारे विचारों, कार्यों और कथन के रूप में हमारे कर्म होते हैं जो हमसे होकर वापस हमारे पास ही आते हैं। ऐसे में हमें मान लेना चाहिए कि अगर हमारे साथ कुछ बुरा हो रहा है तो इसकी वजह हम खुद हैं क्योंकि कहीं न कहीं कभी हमने भी किसी के साथ कुछ गलत किया होगा जिसका फल हमें मिल रहा है। साथ ही हमें इस बात को भी ध्यान में रखना चाहिए कि हम इस तरह की गलती भविष्य में दोबारा ना करें।
चूंकि हमें इस बात का पता नहीं रहता कि इन सब की शुरुआत कहां से हुई है इसलिए हमें अपने आस पास ऐसी ऊर्जा उत्पन्न नहीं करनी चाहिए जिससे दूसरों को दुःख पहुंचे या फिर उन्हें कोई नुकसान हो।
क्या सब कुछ पूर्व निर्धारित होता है
जैसा की हमने आपको पहले भी बताया कि हमारे कर्म ही हमारी किस्मत बनाते हैं। हमें अपने पिछले कर्मों और उसके परिणामों को स्वीकार करना चाहिए।साथ ही भविष्य में अच्छे कर्म करने का निर्णय लेना चाहिए।



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