Latest Updates
-
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Jayanti: छत्रपति संभाजी महाराज की जयंती पर अपनों को भेजें ये शुभकामना संदेश -
Aaj Ka Rashifal 14 May 2026: मेष और सिंह राशि वालों की चमकेगी किस्मत, जानें गुरुवार को किन राशियों पर होगी धन वर्षा -
Prateek Yadav Death: प्रतीक यादव की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, इस मेडिकल कंडीशन के चलते हुई मौत -
PCOS का नाम बदलकर हुआ PMOS, जानिए क्या है इसका मतलब और क्यों रखा नया नाम -
प्रतीक यादव ने ऐसे किया था अपर्णा यादव को प्रपोज, 10 साल बाद हुई थी दोनों की शादी, बेहद फिल्मी है लव स्टोरी -
Sonia Gandhi Health Update: सोनिया गांधी की तबीयत बिगड़ी, गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में भर्ती -
कौन थे प्रतीक यादव? जानें अखिलेश यादव के भाई की कैसे हुई मौत, कितनी संपत्ति के मालिक थे, परिवार में कौन-कौन -
Apara Ekadashi Vrat Katha: अपरा एकादशी के दिन जरूर पढ़ें ये व्रत कथा, सभी पापों और प्रेत योनि से मिलेगी मुक्ति -
Apara Ekadashi 2026 Wishes In Sanskrit: अपरा एकादशी पर अपनों को भेजें ये मंगलकारी संस्कृत संदेश और दिव्य श्लोक -
Apara Ekadashi 2026 Wishes: अपरा एकादशी पर प्रियजनों को भेजें भगवान विष्णु के आशीर्वाद भरे ये शुभकामना संदेश
कबीर जयंती: जीवन के अंतिम समय में मोक्षदायिनी काशी छोड मगहर क्यों गए संत कबीर?
पूरे देश में कबीर जयंती के मौके पर अलग अलग कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। हिंदू कैलेंडर में ज्येष्ठ महीने की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा कबीर जयंती के रूप में मनाई जाती है। कबीर साहब तथा संत कबीर के नाम से मशहूर हुए कबीर जी का जन्म संवत 1455 की ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को हुआ था।

इनके नाम से ही कबीरपंथ नाम के संप्रदाय का प्रचलन हुआ। इस संप्रदाय से जुड़े लोग कबीर जी को दिव्य और अलौकिक पुरुष मानते हैं, जिनका अवतार समाज में फैले अन्धविश्वास को दूर करने के लिए हुआ। इस वर्ष संत कबीर दास की जयंती 17 जून को मनाई जा रही है।

समाज में समानता और एकता लाने पर दिया जोर
संत कबीर का पूरा जीवन ही समाज में फैले ढोंग, आडंबर, पाखंड और व्यक्ति पूजा का विरोध करने में बीता। उन्होंने लोगों को अलग अलग स्तर पर होने वाले भेदभाव से ऊपर उठकर एकता के सूत्र में बंधकर रहने का ज्ञान दिया। संत कबीर ने एक लेखक और कवि के तौर पर लोगों को जागृत करने की कोशिश की। उन्होंने अपना पूरा जीवन ही मानव कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। अपने जीवन के अंतिम दौर में भी वो इसी काम में लगे रहे। कबीर जी यूं तो काशी में रहे लेकिन जीवन के अंतिम समय में वो मगहर चले गए थे। ऐसा करने के पीछे भी उनका एक उद्देश्य था। दरअसल इस स्थान के बारे में ये अन्धविश्वास फैला हुआ था कि यहां मरने वाले व्यक्ति को नरक मिलता है। उसी भ्रांति को तोड़ने के लिए वो मगहर गए और 1518 में इस दुनिया से कूच कर गए।

दोनों संप्रदायों से मिला सम्मान
संत कबीर ने किसी धर्म या जाति विशेष के लिए काम नहीं किया बल्कि वो समाज में सद्भावना और समानता लाना चाहते थे। वो हिंदू धर्म में ढोंगी पंडितों को निशाना बनाते थे तो वहीं दूसरी तरफ पाखंडी मौलानाओं को भी ताक पर रखते थे। यही वजह है कि दोनों मजहब में उन्हें विशेष स्थान प्राप्त था। मगहर में उनकी समाधि और मजार दोनों मौजूद हैं।

शव के स्थान मिले थे फूल
ऐसा माना जाता है कि संत कबीर की मृत्यु के बाद उनके दाह संस्कार को लेकर हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग लड़ने लग गए थे। दोनों अपने अपने तरीके से उनकी अंतिमक्रिया करना चाहते थे। मगर जब कबीर जी के शव से चादर हटाई गयी तब वहां फूलों का ढेर मौजूद था। तब हिंदू और मुसलमानों ने फूल आधे आधे बांट लिए और अपने तरीके से उन फूलों का अंतिम संस्कार किया।



Click it and Unblock the Notifications