जब भीष्म को मृत्यु शैय्या पर देख हंसने लगी द्रौपदी

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हम महाभारत से जुड़ी कई रोमांचित कर देने वाली घटनाएं आपके समक्ष अपने लेखों द्वारा प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं। आज भी हम आपको भीष्म पितामह से जुड़ी एक कहानी बताएंगे जिसमें भीष्म को मृत्यु शैया पर देख द्रौपदी ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी थीं और शिखण्डी से भीष्म की मृत्यु का क्या तालुक था? आइए जानते हैं।

कौन थे भीष्म?

भीष्म या भीष्म पितामह महाभारत के महत्वपूर्ण पात्रों में से एक थे। इनका मूल नाम देवव्रत था। भीष्म के पिता का नाम शांतनु और माता गंगा थीं। शांतनु का दूसरा विवाह निषाद कन्या सत्यवती से हुआ था। कहते हैं अपने पिता का विवाह सत्यवती से कराने के लिए भीष्म ने सारा राज पाठ त्याग कर आजीवन विवाह न करने की प्रतिज्ञा ली थी। बाद में सत्यवती के चित्रांगद और विचित्रवीर्य नाम के दो पुत्र हुए थे।

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काशी नरेश की पुत्रियों का किया अपहरण

महाभारत की कथा के अनुसार भीष्म ने काशी नरेश की तीन पुत्रियों अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका का अपहरण सत्यवती के पुत्र चित्रांगद और विचित्रवीर्य से विवाह करने के लिए किया था। इन तीनों में से अम्बिका और अम्बालिका ने तो विवाह के लिए स्वीकृति दे दी थी किंतु अम्बा ने विवाह के लिए इंकार कर दिया क्योंकि वह चेदि के राजा शल्य से प्रेम करती थी। जब भीष्म को इस बात का पता चला तो उसने अम्बा को वापस भेज दिया था किंतु शल्य ने उसे अपनाने से इंकार कर दिया। तब अम्बा पुनः लौट कर भीष्म के पास आयी और कहा कि वह उससे विवाह कर ले पर भीष्म ने तो आजीवन विवाह न करने की प्रतिज्ञा ले रखी थी इसलिए उसने अम्बा का प्रस्ताव ठुकरा दिया था।

अम्बा ने लिया शिखण्डी के रूप में दूसरा जन्म

कहते हैं जब भीष्म ने अम्बा से शादी करने के लिए इंकार कर दिया था तब क्रोधवश उसने भीष्म को श्राप दे दिया था कि जिस प्रकार उसका जीवन नष्ट हुआ है ठीक उसी प्रकार भीष्म का जीवन भी नष्ट हो जाएगा। वह अपना अगला जन्म पुरुष के रूप में लेगी और भीष्म की मृत्यु का कारण बनेगी।

भीष्म से प्रतिशोध लेने के लिए अम्बा ने शिव जी का सहारा लिया, उसने भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की और उनसे वरदान प्राप्त कर महाराज द्रुपद के यहां जन्म लिया जिसका नाम शिखंडी रखा गया। शिखण्डी का जन्म पंचाल नरेश द्रुपद के घर मूल रुप से एक कन्या के रुप में हुआ था। कहा जाता है कि उसके जन्म के समय एक आकशवाणी हुई थी कि उसका पालन पोषण एक पुत्री नहीं बल्कि एक पुत्र के रुप मे किया जाए।

पांडवों की ओर से किया महाभारत में शिखण्डी ने युद्ध

जब महाभारत का युद्ध शुरू हुआ तब शिखण्डी ने पांडवों की ओर से युद्ध किया था। कहते हैं कुरुक्षेत्र में युद्ध के 10वें दिन शिखंडी उनके समक्ष आ गया था और भीष्म ने अम्बा के इस रूप को पहचान लिया था। तभी अर्जुन ने शिखण्डी के पीछे से आकर भीष्म पर बाणों की बौछार कर दी और उन्हें बाण शैया पर लेटा दिया।

भीष्म को पिता से मिला था वरदान

अपने पिता की खातिर भीष्म ने आजीवन विवाह न करने की प्रतिज्ञा ली थी इसलिए उनके पिता ने भावुक होकर अपने पुत्र को यह वरदान दिया था कि जब तक वह खुद नहीं चाहेगा उसकी मृत्यु नहीं हो सकती और कोई उसे नहीं मार सकता। भीष्म अपनी इच्छा से ही मर सकते हैं अगर उनकी इच्छा न हुई तो वे कभी मृत्यु को प्राप्त नहीं होंगे और अमर हो जाएंगे।

भीष्म को मृत्यु शैया पर देख हंस पड़ी द्रौपदी

भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था इसलिए वे अर्जुन के बाणों से भी नहीं मरे। वे बाणों की शैया पर लेट कर ही हर रोज़ युद्ध देखा करते थे। नियमों के अनुसार शाम के बाद युद्ध रोक दिया जाता था। तब सभी लोग उनके पास जाकर बैठते थे और उनका प्रवचन सुनते थे। एक दिन जब वे प्रवचन दे रहे थे तब द्रौपदी ज़ोर से हंस पड़ी, इस पर भीष्म को बहुत क्रोध आया। तब उन्होंने द्रौपदी से कहा कि हस्तिनापुर की वधू को ऐसा काम शोभा नहीं देता। इस पर द्रौपदी ने व्यंग्य कसते हुए कहा कि जब सबके सामने कौरवों द्वारा उसका अपमान किया जा रहा था तब किसी ने भी बीच में आकर रोकने की कोशिश नहीं की थी और आज वे मृत्यु की शैया पर होने के बावजूद प्रवचन दे रहे हैं।

तब भीष्म ने द्रौपदी से क्षमा मांगी और कहा कि उस वक़्त वह कौरवों का दिया हुआ अन्न ग्रहण कर रहे थे जिसका स्वाद उनकी जीभ पर था इसलिए जब द्रौपदी का चीर हरण हो रहा था तब वे कुछ नहीं कह पाए थे।

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    English summary

    know why Draupadi laughed loudly on Bhishma's death bed

    The Pandavas were shocked on seeing their wife laugh at their Pitamaha. She questioned why the Pitamaha remained mute while she was humiliated at the hands of Dusshasana who was instructed by his brother Duryodhana to outrage her modesty.
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