जैन गुरुओं की मृत्यु

Zen Masters
कई सालों तक चीन में रहने के बाद जैन गुरु होशीन जापान के उत्तरी मुंह वाले क्षेत्र में लौट आये। उन्होंने अपने शिष्यों को गुरु तोकुफु की मृत्यु के बारे में कहानी सुनाई। पच्चीस दिसम्बर के दिन, गुरु तोकुफु ने अपने शिष्यों से कहा, "मैं अगले साल जिंदा नहीं रहने वाला हूँ, इसलिए तुम सबको मुझसे इस साल अच्छा बर्ताव करना चाहिए"। उनके शिष्यों को लगा की वह मज़ाक कर रहे हैं, पर गुरु के बड़े दिल को देखते हुए, हर एक ने उनके जाने वाले साल में उनको दावत दी।

नए साल की संध्या पर तोफुकू ने कहा, "तुम सब लोग मेरे साथ बढ़िया रहे। कल दोपहर जब हिमपात रुक जाएगा तो मैं तुम लोगों को छोड़ जाऊंगा।" शिष्यों ने गुरु के शब्दों को गंभीरता से नहीं लिया और सोचा की वह ऐसा अपने बुढ़ापे की वजह से कह रहे हैं। उन्हें इस बात का पूर्ण विश्वास हो गया क्योंकि आसमान बिलकुल साफ़ था और हिमपात की कोई संभावना नहीं थी। फिर भी आधी रात को हिमपात होने लगा। सवेरा होने पर शिष्यों ने गुरु को नहीं पाया। बाद में वह चिंतन कक्ष में मिले जहाँ उनकी मृत्यु हो गयी थी।

होशीन ने अपने शिष्यों के सामने ये कहानी समाप्त करते हुए कहा की यह ज़रूरी नहीं है की जैन गुरु अपनी मौत की घोषणा करे। फिर भी अगर वह ऐसा करना चाहता है तो कर सकता है। "क्या आप?", एक ने पूछा।

"हाँ, अगले सात दिनों में मैं तुम सबको कुछ दिखाऊंगा" तोफुकू के शिष्यों की तरह होशीन के शिष्यों ने भी अपने गुरु को गंभीरता से नहीं लिया। कुछ तो इस बात को भूल गए जब तक गुरु ने सबको फिर से इकठ्ठा किया। होशीन ने कहा, "सात दिन पहले मैंने कहा था की मैं तुम सबको छोड़ जाऊंगा। तो भी विदाई कविता लिखना प्रचलित है।

चूँकि मैं न तो कोई कवि हूँ और न ही सुलेखक, तुम में से एक मेरे अंतिम शब्द लिख दो" जब एक शिष्य लिखने के लिए तैयार हुआ, होशीन ने लिखवाया, "मैं प्रतिभा से आया। और प्रतिभा में लौटा। ये क्या है?" लेखक ने कहा, "सर, प्रचलित चार पंक्तियों के लिए यहाँ एक पंक्ति की कमी है"। शेर की तरह तेज़ दहाड़ के साथ होशीन चिल्लाये "का" और चल बसे।

Story first published: Thursday, August 30, 2012, 17:24 [IST]
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