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महाकुंभ 2019: इन पवित्र तिथियों पर करें स्नान, होगी मोक्ष की प्राप्ति

महाकुंभ 2019 की शुरुआत हो चुकी है। करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु इसमें हिस्सा लेते हैं। हिंदू धर्म में कुंभ के मेले को बहुत ही पवित्र तीर्थ यात्रा माना गया है। ऐसी मान्यता है कि पावन गंगा नदी में डुबकी लगाकर भक्त अपने सभी पापों से मुक्ति पाते हैं। साथ ही उन्हें मोक्ष की भी प्राप्ति होती है। माना जाता है कि कुंभ का आयोजन राजा हर्षवर्धन के राज्यकाल (664 ईसा पूर्व) में आरंभ हुआ था।

सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही कुंभ के मेले का आरंभ हो गया है और नागा साधू, संतों के साथ अन्य भक्तों के संगम में डुबकी लगाने का सिलसिला जारी है। कुंभ के मेले में स्नान का विशेष महत्व होता है और यदि शुभ तिथियों पर स्नान किया जाए तो वो और भी फलदायक होती हैं।
वैसे तो इस पवित्र स्नान के लिए हर दिन ही शुभ होता है लेकिन कुछ तिथियां ऐसी भी होती हैं जिन्हें स्नान के लिए ज़्यादा ख़ास माना जाता है। तो आइए जानते हैं इस बार कुंभ के मेले में स्नान करने के लिए कौन कौन सी तिथियां प्रमुख हैं।

मकर संक्रांति (15 जनवरी)
इस दिन पहला शाही स्नान होता है। लोग स्नान के साथ व्रत भी करते हैं साथ ही अपने सामर्थ्य अनुसार दान भी करते हैं।
पौष पूर्णिमा (21 जनवरी)
पौष मास के शुक्ल पक्ष की 15वीं तिथि को पौष पूर्णिमा कहा जाता है। इस पूर्णिमा पर पूर्ण चंद्र निकलता है। दुनिया के इस सबसे बड़े धार्मिक सम्मेलन की अनौपचारिक शुरुआत इस दिन से चिन्हित हो जाती है।
मौनी अमावस्या (4 फरवरी)
दूसरे शाही स्नान के लिए मौनी अमावस्या का दिन सबसे ज़्यादा शुभ माना जाता है। इसी दिन प्रथम तीर्थकर ऋषभ देव ने संगम के जल में स्नान कर अपना लंबा मौन व्रत तोड़ा था।
बसंत पंचमी (10 फरवरी)
तीसरे शाही स्नान के लिए विद्या की देवी सरस्वती के अवतरण का दिन बहुत ही ख़ास माना जाता है।
माघी पूर्णिमा (19 फरवरी)
कहते हैं इस दिन पवित्र घाटों पर स्नान करके मृत्यु के पश्चात स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है।
महाशिवरात्रि (4 मार्च)
महादेव और माता पार्वती के विवाह का यह दिवस कल्पवासियों का अंतिम स्नान पर्व है।
इन जगहों पर होता है कुंभ मेले का आयोजन

इलाहाबाद - प्रयाग का कुंभ सबसे अधिक महत्व रखता है।
हरिद्वार - हरिद्वार हिंदुओं का एक प्रमुख तीर्थस्थान है। यहां मेले की तिथि की गणना करने के लिए सूर्य, चन्द्र और बृहस्पति की स्थिति की आवश्यकता होती है। इस तीर्थ स्थल का संबंध मेष राशि से है।
नासिक - बारह वर्षों में एक बार सिंहस्थ कुम्भ मेला नासिक एवं त्रयम्बकेश्वर में आयोजित होता है। नासिक उन चार स्थानों में से एक है, जहां अमृत कलश से अमृत की कुछ बूंदें गिरी थीं। श्रद्धालु गोदावरी में स्नान करके मोक्ष प्राप्ति की कामना करते हैं।
उज्जैन - उज्जैन शिप्रा नदी के तट पर बसा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शून्य अंश (डिग्री) उज्जैन से शुरू होता है। यह नगरी 7 पवित्र मोक्ष पुरी या सप्त पुरी में से एक है। शिव जी ने त्रिपुरा राक्षस का वध यहीं किया था।



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