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क्यों हुआ था एक असुर से तुलसी जी का विवाह

हिंदू धर्म में तुलसी के पौधे को देवी का रूप मानकर इसकी पूजा की जाती है। कहते हैं घर के आँगन में तुलसी का पौधा लगाना बड़ा ही शुभ होता है और सुबह शाम इसकी पूजा करने से घर में सुख शान्ति और समृद्धि बनी रहती है।
किसी भी पूजा में तुलसी के पत्ते का प्रयोग शुभ और शुद्ध माना गया है। ख़ास तौर पर विष्णु जी की पूजा में तुलसी के पत्ते चढ़ाने से भगवान बहुत प्रसन्न होते हैं। इसके आलावा विष्णु जी के ही एक स्वरुप भगवान शालिग्राम तुलसी जी के पति हैं। किन्तु एक देवता ऐसे भी हैं जिनकी पूजा में तुलसी का प्रयोग वर्जित माना गया है वो और कोई नहीं बल्कि प्रथम पूजनीय श्री गणेश हैं।
आइए जानते हैं माता तुलसी और शालीग्राम की कहानी साथ ही यह भी जानते हैं कि गणेश जी को क्यों नहीं पसंद है तुलसी।

कौन है भगवान शालिग्राम
काले रंग के चिकने पत्थर को भगवान शालिग्राम के रूप में पूजा जाता है। यह पत्थर विशेष रूप से नेपाल स्थित गंडकी नदी में पाए जाते हैं। कहते हैं भगवान शालिग्राम को तुलसी बहुत ही प्रिय है इसलिए शालिग्राम के पत्थर पर तुलसी का पत्ता अर्पित करने से यह अपने भक्तों की मनोकामना ज़रूर पूरी करते हैं। इसके आलावा हम सब जानते हैं कि विष्णु जी की ही पूजा भगवान सत्यनारायण की पूजा है। इस पूजा में भी शालिग्राम के पत्थर को रखना बहुत ज़रूरी होता है।
कहा जाता है घर में एक से ज़्यादा शालिग्राम नहीं होने चाहिए। साथ ही जिस भी घर में शालिग्राम होता है उन्हें साफ़ सफाई का ख़ास ध्यान रखना चाहिए। जिस प्रकार बिना स्नान किये तुलसी के पौधे को छूना वर्जित माना गया है ठीक उसी प्रकार भगवान शालिग्राम को भूल कर भी बिना नहाए कभी नहीं छूना चाहिए। इनकी पूजा में मनुष्य को अपने तन के साथ मन को भी साफ़ रखना चाहिए तभी उसकी प्रार्थना स्वीकार होती है।
क्यों है तुलसी इतनी प्रिय
शिवपुराण के अनुसार दंभ नामक दैत्य को भगवान विष्णु के आशीर्वाद से पुत्र की प्राप्ति हुई थी जिसका नाम शंखचूड़ था। शंखचूड़ जब बड़ा हुआ तो उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मदेव ने उसे वरदान मांगने को कहा। तब शंखचूड़ ने उनसे कहा कि "हे ब्रह्मदेव आप मझे ऐसा वरदान दीजिये कि मैं देवताओं के लिए अजय हो जाऊं, मुझे कोई न हरा सके", उसकी बात सुनकर ब्रह्मा जी ने उसे बदरीवन जाकर वहां तपस्या कर रही तुलसी जी से विवाह करने के लिए कहा।
कहते हैं जब शंखचूड़ वहां पहुंचा तो वह तुलसी जी की सुंदरता से मोहित हो गया। ब्रह्मा जी ने स्वयं उन दोनों का गंधर्व विवाह सम्पन्न कराया था। तुलसी जी से विवाह के पश्चात शंखचूड़ और भी शक्तिशाली हो गया।
शंखचूड़ श्री कृष्ण का परम भक्त था। वह हमेशा उनकी भक्ति में ही लीन रहता था लेकिन उसे अपनी शक्तियों पर अहंकार हो गया था। उसने अपने बल से समस्त देवताओं पर भी विजय प्राप्त हासिल कर ली थी। एक दिन सभी देवतागण परेशान होकर विष्णु जी के पास गए और अपनी समस्या का समाधान करने को कहा। ब्रह्मदेव ने उन्हें बताया कि शंखचूड़ का वध शिव जी के त्रिशूल से ही संभव है।
कहा जाता है कि जैसे ही शिव जी ने अपना त्रिशूल शंखचूड़ को मारने के लिए उठाया ठीक उसी समय एक आकाशवाणी हुई कि जब तक श्री हरि का दिया हुआ कवच शंखचूड़ के पास है और जब तक उसकी पत्नी का सतीत्व भंग नहीं होता तब तक शंखचूड़ को मारना असंभव है।
इस भविष्यवाणी के बाद विष्णु जी वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर शंखचूड़ के पास गए और उससे वो कवच दान में मांग लिया। शंखचूड़ ने वह कवच निसंकोच ही ब्राह्मण को दे दिया फिर विष्णु जी ने शंखचूड़ का रूप धारण किया और सीधे तुलसी जी के पास पहुंचे। अपने पति को देख तुलसी ने उनका आदर सत्कार किया किन्तु पति के रूप में आए विष्णु जी को स्पर्श करते ही वह समझ गई की वह उसके स्वामी नहीं है।
तब क्रोध में आकर उसने विष्णु जी को श्राप दे दिया कि वह एक पत्थर में तब्दील हो जाएं। विष्णु जी ने तुलसी जी को बताया कि उन्होंने विष्णु जी को प्राप्त करने के लिए कई वर्षों तक कठोर तपस्या की है इसलिए अब समय आ गया है कि वह अपने इस शरीर को त्याग कर एक दिव्य शरीर धारण करे।
भगवान ने तुलसी जी से कहा कि उनका यह दिव्य शरीर नदी के रूप में बदला जाएगा और गंडकी नदी के नाम से जाना जाएगा। साथ ही इसी नदी के समीप विष्णु जी भी शालिग्राम शिला के रूप में निवास करेंगे।
प्रत्येक वर्ष प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान शालिग्राम व तुलसी का विवाह संपन्न कर मांगलिक कार्यों का प्रारंभ किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि तुलसी- शालिग्राम विवाह करवाने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और साथ ही अतुल्य पुण्य भी मिलता है।
श्री गणेश के कारण हुआ था तुलसी जी का शंखचूड़ से विवाह
एक कथा के अनुसार एक बार गणेश जी गंगा के किनारे तपस्या कर रहे थे। तभी वहां तुलसी जी आयीं और उनसे विवाह करने के लिए कहने लगी। गणेश जी ने बड़े ही आदर के साथ उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया लेकिन तुलसी को यह उनका अपमान लगा। जिसके पश्चात् क्रोध में आकर उन्होंने गणपति को श्राप दे दिया कि उनके दो दो विवाह होंगे।
तुसली जी के श्राप से गणेश जी को भी क्रोध आ गया और उन्होंने भी तुलसी जी को श्राप दे दिया कि उनका विवाह एक असुर से होगा। गजानन की यह बात सुनकर तुलसी जी उनसे क्षमा याचना करने लगीं। तब गणेश जी ने उनसे कहा कि एक असुर से विवाह होने के पश्चात भी तुम भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को प्रिय रहोगी और इसके आलावा कलयुग में तुम जीवन और मोक्ष देने वाली होगी। किन्तु मेरी पूजा में तुम्हारा कोई स्थान नहीं होगा, तुम्हारा उपयोग मेरी पूजा में वर्जित माना जाएगा।
श्री गणेश के इसी श्राप के कारण तुसली जी का विवाह शंखचूड़ से हुआ था।



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