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मिलिए इन 'फेमिनिस्ट फादर्स' से जिन्होंने बेटियों के लिए बदली दुनिया....
मिलिए इन पिताओं से जो जिन्होंने अपनी बेटियों के हक और अधिकारों के लिए उठाई आवाज।
मां बच्चों को गर्भ में पालती है और पिता अपने दिमाग में... दंगल फिल्म का यह डॉयलॉग तो आपको याद ही होगा। वास्तविकता में यह बात बिल्कुल सही है, क्योंकि बच्चें के पैदा होने से लेकर बड़े होने तक पिता हर सुख सुविधा का इंतजाम करने में व्यस्त रहते हैं। आज फादर्स डे के मौके पर हम कुछ ऐसे पिता की दास्तां बता रहे हैं जिन्होंने अपनी बेटियों के हक और प्रतिष्ठा के लिए समाज के खिलाफ खड़े होकर आवाज उठाई। जिन्होंने अपने बेटियों की समानता के लिए जंग लड़ी तो किसी ने अपनी बेटी के सपने पूरा करने के लिए समाज की हर बनाई दीवार तोड़ दी। इनकी इस परवरिश के चलते उन्हें 'फेमिनिस्ट फादर्स' कहा जाने लगा है। आइए इस फादर्स डे पर हम आपको दुनिया के फेमिनिस्ट फादर से मिलवाते हैं, जिन्होंने अपनी बेटियों की दुनिया संवारने के लिए दुनिया ही बदल दी।

खतना रोकने के लिए बनाया 'अनकट गर्ल्स' ग्रुप
खतना या सुन्नत एक तरह कि शारीरिक शल्यक्रिया है जिसमें आमतौर पर मुसलमान नवजात लड़के और लड़कियों के लिंग के ऊपर की चमड़ी काटकर अलग की जाती है। लड़कियों के केस में खतना में योनि के एक हिस्से क्लाइटॉरिस को निकाल दिया जाता है। या फिर कुछ जगहों पर क्लाइटॉरिस और योनि की अंदरूनी त्वचा को भी आंशिक रूप से हटा दिया जाता है। ऐसे में इथोपिया के 38 वर्षीय केबिबी के इस खतने के खिलाफ थे। और वह नहीं चाहते थे कि उनकी 9 साल कि बेटी का खतना हो। इसलिए उन्होंने बेटी कि शिक्षा पर जोर दिया और स्कूल स्टूडेट्स संग मिलकर इस दर्दनाक प्रथा को समाप्त करने के लिए प्रेरित किया। लोगों को जागरुक करने के लिए उन्होंने अपने स्कूल में 'अनकट गर्ल्स' नामक ग्रुप बनाया है, जिसके तहत वह इस प्रथा के विरोध में काम करते है। लोगों में एफजीएम (फीमेल जेंटल मुटीलेशन) के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिए केबिबि बच्चों के साथ मिलकर रैली निकालते है और संदेश देते है। उनके इन्हीं प्रयासों के चलते उनके इस फाउंडेशन से शहर के कुछ और लड़के भी जुड़ चुके है।

सपनो पूरे करने लिए लिए दिए पंख
गुटामेला के अलविरों को जब पता चला कि उसकी 11साल कि बेटी नेदीलिन, आम बच्चों कि तरह चलने में असमर्थ है, तब उन्होंने परेशान होने के बजाएं बच्ची के लिए कुछ करने कि ठानी। अपनी इस लगन के चलते ही अलविरों ने नेदीलिन के लिए स्पेशल ऐसे जूते बनाएं, जिनकी मदद से वह आज आराम से चल फिर सकती है। आज नेदीलिन अपने हमउम्र के बच्चों के साथ आराम से स्कूल जा सकती है। अलविरों खुश है कि आज उनकी बच्ची स्कूल जा रही है और पढ़ाई पूरी कर वह अपने कदमों पर खड़ी हो सकती है।

ईको फ्रैंडली सेनेटरी पेड
मासिक धर्म कि प्रक्रिया से हर लड़की हो हर महीनें गुजरना होता है। ऐसे में युगांडा के विलियम ने अपनी 11 साल कि बेटी एंजी के पहले मासिक धर्म पर न सिर्फ उसका विश्वास बढ़ाया बल्कि उसके लिए ईको सैनेटरी पैड्स बनाएं। हालांकि यह स्थिति विलियम और एंजी दोनों के लिए असहज थी। मासिक धर्म के दौरान एंजी को स्कूल जाने में बहुत समस्या होती थी और महंगे डिस्पोजल सेनेटरी पैड खरीदना बहुत मुश्किल काम था।
हालांकि युगांडा में लड़कियां इस बारे में अपने पिता से खुलकर इस बारे में बात करने में झिझक करने में
क्योंकि एंजी अपने पिता से लड़की होने के नाते अपने पिता से यह बातें साझा नहीं कर सकती थी। और विलियम एक पुरुष होने के नाते इस स्थिति को समझते हुए विलियम ने एंजी जैसी बच्चियों के लिए आगे बढ़कर ईको सैनेटरी पैड्स उपलब्ध करवाना शुरू कर दिया।

बाल विवाह का विरोध
बांग्लादेश के नाजीर और शारीन का बाल विवाह हुआ, जिसके चलते उन्हें अपनी स्कूलिंग बीच में ही छोड़ने पड़ी। तभी से दोनों ने यह तय कर लिया था, कि वह अपने बच्चों को शिक्षा का पूरा अवसर देंगे। इसलिए जब उनके यहां बेटी टोनी का जन्म हुआ तो उन्होंने तय कर लिया कि वह टोनी को पढ़ा लिखाकर डॉक्टर बनाएंगे। इसलिए नाजीर और शारीन ने मिलकर बाल विवाह के विरूध मुहिम छेड़ी हैं। एक अनुमान के मुताबिक 720 मिलियन लड़कियों को मजबूरन बाल विवाह करना पड़ता हैं।

बेटी को बनाया सक्षम
दिल्ली के सल्म ऐरिया में रहने वाले मजदूर विजय दिन का 350 रुपए कमाते है। ऐसे में बेटी कोमल को पढ़ा लिखाकर सक्षम बनाना एक चुनोती थी। लेकिन विजय ने हार नहीं मानी और उन्होंने एक एनजीओं कि मदद से बेटी को पढ़ाया। कोमल आज पढ़ लिखकर फास्ट फूड रेस्ट्रॉन्ट में काम कर हायर एजुकेशन के लिए फंड जमा कर रही है। साथ ही विजय भी खुश है कि उन्होंने सामाजिक नीतियों से परे सोचकर बेटी में विश्वास जगाया और उसे सक्षम बनाया।



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