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कैसे बनें एक बेफिक्र मम्मी?
आप घबराना और उत्तेजित होना बंद करें। अपने बच्चे को लेकर आपको ज्यादा सावधान और सजग होने की जरूरत है। पर सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि आप खुद को थोड़ा शांत रखें। हमारा वादा है कि इससे आप एक बुरी मां नहीं बनेंगी।
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अपने बच्चे पर विश्वास करें ताकि वह आपको अपनी जरूरतें बता सके
नवजात बच्चे भले ही लाचार नजर आते हों, पर वह अपनी भाव भंगिमा, आवाज और रो कर आपसे कम्युनिकेट करते हैं। लेखक और मनोवैज्ञानिक डेविड चैम्बरलैन 'द माइंड आफ योर न्यबॉर्न बेबी' में लिखते हैं कि नवजात बच्चे बोलने से पहले ही अपने हाव भाव के जरिए अपनी बात रखने में सक्षम होते हैं। मसलन, अगर बच्चा अपना हाथ आगे की ओर बढ़ाए तो वह गोद लेने के लिए कह रहा है, आपको रहस्यमयी अंदाज में देखे मतलब वह किसी चीज के बारे में जानना चाहता है, मुंह बनाए या चिल्लए मतलब उन्हें कोई चीज पसंद नहीं है या उन्हें कोई चीज चाहिए, कूजे या गड़गड़ए मतलब उन्हें कोई चीज पसंद है या वह अच्छा महसूस कर रहा है और चकित हो जाए यानी वह रोमांचित है, वगैरह वगैरह। 'बेबी नोज बेस्ट' के लेखक डेबोराह सोलोमन कहते हैं कि बच्चे को लाचार के बजाय सक्षम समझना बुनियादी रूप से उनसे बातचीत करने की अवधारणा को बदल देता है। आपको बस बच्चे से बात करने की कला आनी चाहिए।

बच्चे को क्षमता के अनुसार काम करने दें
आप किसी तरह की प्रतियोगिता में तो हैं नहीं कि आपको अपने लक्ष्य तक पहुंचना है। क्या वह कुछ करना नहीं चाहता? कोई बात नहीं, वह तैयार नहीं है। क्या वह पॉटी नहीं कर रहा? वह करेगा। सोलोमन कहते हैं कि जल्दी होना हमेशा अच्छा नहीं होता। यकीनन कुछ बच्चों को ज्यादा सपोर्ट की जरूरत होती है, पर पहले अपने बच्चे को यह बात आपको बतलाने तो दें। आपके बच्चे के साथ कुछ होने पर आप आसानी से दबाव में आ जाती हैं। खासकर तब जब दूसरे बच्चों की मांएं अपने बच्चे के बारे में शेखी बघारने लगती हैं। ऐसे में आप बिल्कुल भी चिंतित न हों। पर हां, अपने बच्चे को लेकर लापरवाह न हो जाएं। कई बार उन्हें डाक्टर को भी दिखाने की जरूरत पड़ती है। अगर आपका बच्चा दो महीने का होने पर भी न हंसे, 6 महीने का होने पर रोलिंग ओवर न करे, 9 महीने का होने पर बिना सहारे के न बैठ पाए या 12 महीने का हो जाने पर खाने को हाथ से न उठाए तो आपको के पास जाना चाहिए।
बच्चे को थोड़ा पर्सनल स्पेस दें
क्या आपको ऐसा लगता है कि बच्चों के साथ बहुत ज्यादा खेलना चाहिए? अगर हां तो ऐसा नहीं है। बच्चा अभी अभी तो पैदा हुआ है। अचानक से उन्हें खिलौनों की तरह-तरह के आवाज सुनाना बिल्कुल भी अच्छा नहीं। उन्हें बस चीजों को अपने हिसाब से देखने दें। सोलोमन कहते हैं कि बच्चे के लिए सबकुछ नया होता है। उन्हें अपने आसपास की चीजों को अकेले देखने दें। इसी से वह अपना मनोरंजन भी करता है। अगर आप उनके साथ ज्यादा समय बिताएंगे तो उन्हें बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगेगा।
बच्चे को गलती करने दें
सोलोमन कहते हैं कि जब बच्चा पहले पहल चलने की कोशिश करता है तो वह जरूर गिरता है। आपको ऐसा लगता होगा कि उन्हें चोट लगी है, पर शायद ऐसा न हो। बच्चे के गिरने पर अगर आप घबराकर और चकित होकर कुछ कहेंगे तो बच्चा डर जाएगा। इसके बजाय आराम से कहें, 'ओह, तुम गिर गए।' इससे बच्चे पर किसी तरह का डर हावी नहीं होगा। अगर वास्तव में उन्हें चोट लगी होगी तो वह आपको बता देगा।
बच्चे को बताएं कि क्या हो रहा है
जिस तरह हमारे अंदर किसी चीज को जानने की इच्छा होती है, उसी तरह बच्चे भी हर चीज जानना चाहते हैं। अगर आप बच्चे को बताएंगे कि आप क्या कर रहे हैं तो वह कम व्याग्रता के साथ बड़ा होगा, क्योंकि उन्हें पता होगा कि उनके साथ क्या हो रहा है। साथ ही आप की बात सुनकर वह बोलना भी सीखेगा। पर हां, आप उनपर ज्यादा से ज्यादा शब्द सीखने का दबाव न बनाएं।
अपने बच्चे को समझने के लिए समय दें
बेशक बच्चा आपका है, पर इसका मतलब यह नहीं कि आप उनके बारे में सबकुछ जानते हैं। निश्चित रूप से वह आपके गर्भ में 9 महीने रहा है, फिर भी आप उनके लिए अजनबी ही हैं। सोलोमन कहते हैं कि एक पेरेंट होने के नाते जरूरी नहीं कि आपको अपने बच्चे के सारे सवालों के जवाब पता हों। अगर वह रो रहा है तो शायद आपको पता न हो कि वह क्यों रो रहा है। पेरेंट को अपने बच्चे को चुप कराने की इतनी जल्दी रहती है कि वे गलती कर जाते हैं। बच्चे को चुप कराने के बजाय यह जानने की कोशिश करें कि वह क्यों रो रहा है। वह भूखा है, थका हुआ है, उन्हें गर्मी या ठंड लग रही है, डायपर की समस्या है, वह गोद लेने के लिए कह रहा है या फिर उन्हें अच्छा नहीं लग रहा है। बच्चे की जरूरत को नजरअंदाज कर कभी भी उसे शांत करने की कोशिश न करें।
खुद को समय दें
इस बात में कोई शक नहीं कि बच्चे की देखभाल करने के लिए आपको 24 घंटे देने पड़ते हैं। कई बार अपने बच्चे की देखभाल के लिए किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश करना जिन पर आप विश्वास कर सकें, काफी मुश्किल होता है। साथ ही जितने समय आप अपने बच्चे से दूर रहते हैं, आप काफी परेशान रहते हैं। पर सोलोमन चेताते हैं कि अगर जिंदगी में सिर्फ और सिर्फ बच्चे की देखभाल ही करनी होती तो पेरेंट शारीरिक और भावनात्मक रूप से काफी टूट जाते। साथ ही वह गुस्सैल भी हो जाते। इसलिए आप थोड़ा समझौता करें और बच्चे से दूर रहने पर खुद को कसूरवार न ठहराएं। अगर आप खुद को समय देंगे तो आप बच्चे की देखभाल के लिए खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से बेहतर तरह से तैयार कर सकेंगे। घर से दूर रहकर आप कहीं बेहतर मां बन सकती हैं।



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