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गर्भावस्था में डाइट पेय का सेवन करने से बच्चे में मोटापे का खतरा बढ़ जाता है
एक नए अध्ययन के अनुसार ऐसी गर्भवती महिलायें जो गर्भावस्था के दौरान दिन में कम से कम एक बार मीठा पेय पीती हैं उनके बच्चों का वज़न आवश्यकता से अधिक होता है या 7 वर्ष की उम्र तक आते आते वे बच्चे मोटे हो ज
एक नए अध्ययन के अनुसार ऐसी गर्भवती महिलायें जो गर्भावस्था के दौरान दिन में कम से कम एक बार मीठा पेय पीती हैं उनके बच्चों का वज़न आवश्यकता से अधिक होता है या 7 वर्ष की उम्र तक आते आते वे बच्चे मोटे हो जाते हैं।
बचपन के मोटापे से जीवन में आगे कई समस्याओं जैसे डाइबिटीज़, दिल की बीमारियां, स्ट्रोक या किसी प्रकार के कैंसर आदि का सामना करना पड़ता है।
यूनाइस कैनेडी श्रीवर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ चाइल्ड हेल्थ एंड ह्यूमन डेवलपमेंट (एनआईसीएचडी) के अनुसार "हमारे परिणामों के अनुसार गर्भावस्था के दौरान प्राकृतिक शुगर से मीठे किये गए पेयों की तुलना में कृत्रिम रूप से मीठे किये गए पेय का सेवन कभी भी अच्छा नहीं है।"

शोधकर्ताओं के अनुसार जैसे जैसे गर्भाशय में बच्चे के चारों ओर ऐम्नीऑटिक तरल की मात्रा बढ़ती है वैसे वैसे गर्भवती महिलाओं को तरल पदार्थों के सेवन की मात्रा बढ़ानी पड़ती है।
अतिरिक्त कैलोरीज़ से बचने के लिए कई महिलायें चीनी से मीठे किये गए सॉफ्ट ड्रिंक्स या जूस के बजाय ऐसे पेय पदार्थों का सेवन करती हैं जिनमें कृत्रिम स्वीटनर्स मिले होते हैं।
हालाँकि इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ एपिडेमियोलॉजी में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार यह पता चला है कि ऐसी महिलायें जिन्होंने गर्भावस्था के दौरान मीठे पेय पदार्थों का सेवन किया किया उनमें से लगभग 60% महिलाओं के बच्चों का वज़न जन्म के समय अधिक था।
ऐसी महिलायें जिन्होंने गर्भावस्था के दौरान कृत्रिम रूप से मीठे पेय पदार्थों का सेवन किया था उनके बच्चों का वज़न 7 वर्ष की उम्र तक आवश्यकता से अधिक बढ़ गया था या वे मोटे हो गए थे।
चीनी डालकर मीठे किये गए पेय पदार्थों की तुलना में कृत्रिम रूप से मीठे किये गए पेय पदार्थों के सेवन से कोई लाभ नहीं मिलता।
शोधकर्ताओं के आकलन के अनुसार वे गर्भवती महिलायें जो मीठे पेय पदार्थों के बजाय पानी का सेवन करती हैं उनके बच्चों में 7 वर्ष की उम्र तक मोटापे का खतरा 17 प्रतिशत तक कम हो जाता है।
इस अध्ययन के लिए टीम ने 900 से अधिक गर्भावस्थाओं से प्राप्त डाटा का विश्लेषण किया जिनमें ऐसी महिलायें शामिल थी जिन्हें गर्भावस्था के दौरान डाइबिटीज़ हुआ था।
पिछले अध्ययनों के अनुसार जानवरों में वज़न बढ़ने की समस्या पाचन तंत्र के बैक्टीरिया में और अन्य सूक्ष्मजीवों में होने वाले परिवर्तन के कारण होती है।
कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार कृत्रिम स्वीटनर्स से आँतों की ब्लड शुगर ग्लूकोज़ को सोखने की क्षमता बढ़ जाती है।
आईएएनएस से प्राप्त इनपुट के अनुसार



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