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सौभाग्य और अपार धन प्राप्ति के लिए करें अपरा एकादशी का व्रत
हमारे शास्त्रों में एकादशी के व्रत को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। कहते हैं इस दिन व्रत और पूजा करने से मनुष्य के सभी पापों का नाश हो जाता है और उसका जीवन सदैव के लिए सुखमय हो जाता है। आपको बता दें इस महीने अपरा एकादशी 11 मई 2018 को पड़ रही है। अपरा एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित है।
ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी या अचला एकादशी के रूप में जाना जाता है। पुराणों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य अपने सभी पापों से मुक्ति पाकर भवसागर से तर जाता है। साथ ही उसके जीवन से दरिद्रता भी दूर हो जाती है। आइए जानते हैं अपरा एकादशी की व्रत और पूजा विधि साथ ही इससे जुड़ी कथा।

व्रत विधि
कहते हैं अपरा एकादशी पर बिना कुछ खाए व्रत रखना ज़्यादा लाभदायक होता है। लेकिन अगर आप भोजन त्याग कर नहीं रह पा रहे हैं तो फल और दूध का सेवन कर सकते हैं। एकादशी के व्रत में चावल का सेवन भूल कर भी नहीं करना चाहिए। इसके आलावा शहद, बेल धातु की थाली पर खाना भी वर्जित माना गया है।
अपरा एकादशी पर व्रतधारी को तेल का प्रयोग करने से भी बचना चाहिए। अगले दिन सूर्योदय के बाद स्नान करके और भगवान विष्णु की पूजा करके ही अपना व्रत खोला जाता है।
पूजा विधि
सर्वप्रथम सुबह उठकर स्नान कर लें। उसके बाद भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करें। पूजा में तुलसी, श्रीखंड चंदन, गंगाजल व फलों का प्रसाद अर्पित करें। याद रखें इस दिन तुलसी के पत्तों का ना तोड़ें। एक दिन पहले ही पूजा के लिए तुलसी के पत्ते तोड़ कर रख लें।
अपरा एकादशी पर विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना या सुनना बहुत ही लाभकारी माना गया है। साथ ही आप 'ओम नमो नारायण' मंत्र का जाप भी कर सकते हैं। याद रखें अगर आप इस दिन व्रत और पूजा कर रहे हैं तो आपको झूठ, छल और कपट से बचना चाहिए।
अपरा एकादशी व्रत कथा
महीध्वज नामक एक बड़ा ही दयालु राजा था। उस राजा का एक छोटा भाई वज्रध्वज भी था। वज्रध्वज अपने बड़े भाई से बहुत जलता था और हमेशा उसका बुरा चाहता था। एक दिन मौका पाकर वज्रध्वज ने अपने बड़े भाई की हत्या कर दी और जंगल में एक पीपल के नीचे शव को गाड़ दिया। कहते हैं अकाल मृत्यु होने के कारण राजा की आत्मा प्रेत बनकर उसी पीपल पर रहने लगी और उस मार्ग से आते जाते हर व्यक्ति को परेशान करने लगी। एक दिन एक महान ऋषि उस पीपल के पेड़ के पास से गुजर रहे थे। ऋषि ने प्रेत को देखा और अपने तपोबल से उसके बारे में सब कुछ जान गए।
तब ऋषि ने पीपल के पेड़ से राजा की प्रेतात्मा को नीचे उतारा और परलोक विद्या का उपदेश दिया। राजा को प्रेत योनी से मुक्ति दिलाने के लिए उस ऋषि ने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत रखा और द्वादशी के दिन व्रत पूरा होने पर व्रत का पुण्य प्रेत को दे दिया। इस एकादशी व्रत का पुण्य प्राप्त करके राजा को प्रेतयोनी से मुक्ति मिल गयी और वह स्वर्ग चला गया।
अपरा एकादशी व्रत और पूजा का महत्व
अपरा एकादशी के दिन व्रत और पूजा बहुत ही फलदायक माना गया है। इस दिन पूरे विधि विधान और सच्चे मन से की गयी पूजा और प्रार्थना दोनों ही ईश्वर स्वीकार करते हैं। भगवान विष्णु के आशीर्वाद से मनुष्य के सभी पाप धुल जाते हैं और उसके जीवन में सुख और शान्ति बनी रहती है। साथ ही उपासक को अखंड सौभाग्य और समृद्धि की भी प्राप्ति होती है।
इसके आलावा इस दिन गंगा में स्नान करना भी बहुत शुभ माना गया है। कहते हैं गंगा नदी में अपरा एकादशी पर स्नान करने से भक्तों को पुण्य की प्राप्ति होती है।



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