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भीष्म अष्टमी: तीरों की शैय्या पर 58 दिन लेटे रहने के बाद त्यागा था शरीर
भीष्म पितामह एक महान योद्धा, उत्तम नेतृत्वकर्ता ही नहीं थे, महाभारत का ये अहम किरदार ऐतिहासिक तौर पर भी मशहूर है। आने वाली पीढ़ी भी इनके बारे में जानना चाहेगी। भीष्म राजा शांतनु और गंगा की संतान थे। भीष्म पितामह को महाभारत में निभाई इनकी भूमिका के लिए याद किया जाता है। भीष्म अष्टमी वह दिन है जब उन्होंने अपना शरीर त्यागा था।

भीष्म को मिला था इच्छा मृत्यु का वरदान
ये कहा जाता है कि भीष्म पितामह को उनके पिता शांतनु से इच्छा मृत्यु का वरदान मिला था, जिसके अनुसार वो इच्छा होने पर ही मृत्यु को पा सकेंगे। वो दूसरों के नहीं बल्कि अपनी मर्जी से अपना शरीर छोड़ सकते हैं। उनकी इच्छा के विरुद्ध कोई उन्हें मार नहीं सकता था।

महाभारत में भीष्म ने दिया था कौरवों का साथ
सबसे श्रेष्ठ, ज्ञानी, पराक्रमी, अच्छे बुरे की समझ होने के बावजूद भीष्म पितामह ने महाभारत में कौरवों की तरफ से युद्ध करने का फैसला किया था। उन्होंने अपने इस फैसले का औचित्य उस वक्त समझाया जब वो मृत्यु शैय्या पर लेटे थे। उन्होंने उस वक्त बताया कि वो कौरवों के साथ रह रहे थे और उनका नमक भी खाया था, नमक का कर्ज उतारने के लिए उन्हें ये कदम उठाना पड़ा। इस वजह से वो महाभारत में कौरवों के योद्धा बनकर पांडवों के विरुद्ध खड़े हुए थे।

58 दिनों तक तीरों के बिस्तर पर लेटे थे भीष्म
युद्ध के दौरान भीष्म पितामह का ध्यान शिखंडी के कारण विचलित हुआ और इसका लाभ उठाते हुए अर्जुन ने उनपर आक्रमण किया और इस हमले से वो काफी जख्मी हो गए थे। उन्हें लेटाने के लिए बाणों की शैय्या बनाई गयी थी। उनके पास वरदान था कि वो अपनी मर्जी होने पर ही शरीर का त्याग करेंगे। गंभीर रूप से घायल होने पर भी उन्होंने फैसला किया कि जब सूर्य उत्तरायण में होगा तभी वो मृत्यु को गले लगाएंगे। ये कहा जाता है उत्तरायण के दौरान जिस भी व्यक्ति की मृत्यु होती है वो स्वर्ग में जाता है। इस वजह से उन्हें 58 दिनों तक इंतजार करना पड़ा।

2019 में भीष्म अष्टमी
भीष्म पितामह ने अपना शरीर माघ महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को त्यागा था। हर साल ये दिन भीष्म पितामह के पराक्रम को याद करके मनाया जाता है। इस साल यानी 2019 में भीष्म अष्टमी की तिथि 13 फरवरी है।

भीष्म अष्टमी पर किये जाते हैं ये संस्कार
भीष्म पितामह के सम्मान में इस दिन लोग एकोदिष्ट श्राद्ध करते हैं। ये रिवाज व्यक्ति को मृत्यु के बाद स्वर्ग भेजने के लिए की जाती है।
भीष्म पितामह की आत्मा की शांति के लिए लोग तर्पण करते हैं। लोग अपने पूर्वजों के लिए भी ये काम इस दिन करते हैं।
गंगा नदी में डुबकी लगाकर लोग उबले चावल और तिल के दानों का दान देते हैं। कहा जाता है कि इससे पूर्वजों को जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।
कुछ लोग इस दिन उपवास रखते हैं और भीष्म अष्टमी मंत्र का जाप करते हैं।



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