Latest Updates
-
Navratri व्रत के दौरान संभोग करना सही या गलत? पढ़ें धार्मिक और वैज्ञानिक तर्क -
Eid Mubarak Wishes For Love: इस ईद अपने 'चांद' जैसे लवर को भेजें ये रोमांटिक संदेश और शायरी -
मिलावटी कुट्टू का आटा बिगाड़ सकता है सेहत, खरीदारी से पहले ऐसे करें असली-नकली की पहचान -
Navratri 2026: क्या कॉफी पीने से टूट जाता है नवरात्रि का व्रत? जानें क्या कहते हैं धर्म और विज्ञान -
Saudi Arabia में आज Eid है या नहीं? शव्वाल का चांद न दिखने पर किस दिन मनाई जाएगी मीठी ईद -
Navratri 2026: क्या नवरात्रि के 9 दिनों में बाल और नाखून काट सकते है या नहीं? जानें नियम -
क्या पीरियड्स के दौरान रख सकते हैं नवरात्रि व्रत? बीच में मासिक धर्म शुरू हो जाए तो क्या करें -
Rajasthan Diwas 2026: राजस्थान दिवस पर शेयर करें मारवाड़ी बधाई संदेश, दिखाएं अपनी संस्कृति का गौरव -
Gudi Padwa 2026 Wishes: मीठी पूरनपोली का स्वाद...गुड़ी पड़वा पर प्रियजनों को भेजें ये खास शुभकामना संदेश -
Hindu Nav Varsh 2026 Wishes: नई शुरुआत का ये शुभ दिन...इन संदेशों से अपनों को दें हिंदू नववर्ष की शुभकामनाएं
जयंती पर पढ़ें मठों के संस्थापक आदि शंकराचार्य से जुड़ी अनसुनी बातें

भगवान शिव के अवतार आदि शंकराचार्य का जन्मदिवस वैशाख शुक्ल पंचमी यानि 20 अप्रैल को पूरे भारत देश में मनाया जाएगा। महान गुरु शंकराचार्य जो जगत गुरु के नाम से भी विख्यात है, हिन्दू धर्म के विकास और प्रचार प्रसार में इनका बहुत बड़ा योगदान है।
उपनिषदों और वेदांतसूत्रों पर लिखी हुई इनकी टीकाएँ बहुत प्रसिद्ध है। इन्होंने पूरे भारतवर्ष में चार मठों की स्थापना की थी जो आज भी बहुत प्रसिद्ध और पवित्र माने जाते हैं। इन मठों के प्रबंधक तथा गद्दी के अधिकारी 'शंकराचार्य' कहे जाते हैं।
आज इस पवित्र मौके पर आइए नज़र डालते है शंकराचार्य के जीवन और उनके विचारों पर।

शंकराचार्य का जन्म और संन्यास
लगभग 1200 वर्ष पूर्व आदि शंकराचार्य का जन्म कोचीन से 5-6 मील दूर कालटी नामक गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री शिवागुरु और माता का नाम सुभद्रा था। ये जाती से नाबूदरी ब्राह्मण थे। कहते हैं शंकराचार्य के पिता भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे। उन्होंने निरंतर महादेव की पूजा कर उनके आशीर्वाद से शंकराचार्य को पुत्र के रूप में प्राप्त किया था। इस वजह से शिवागुरु शंकराचार्य को महादेव का प्रसाद मानते थे और इसीलिए इनका नाम उन्होंने शंकर रखा था। तीन वर्ष की आयु में इनके पिता का देहांत हो गया।
कहा जाता है कि ये बचपन से ही मेधावी तथा प्रतिभाशाली थे। मात्र छह वर्ष की अवस्था में ही ये प्रकांड पंडित हो गए थे और आठ वर्ष की अवस्था में इन्होंने संन्यास ग्रहण किया था। बारह वर्ष की आयु तक आते-आते शंकराचार्य शास्त्रों के ज्ञाता हो चुके थे। सोलह वर्ष की अवस्था में इन्होने ब्रह्मसूत्र भाष्य सहित सौ से भी अधिक ग्रंथों की रचना कर दी थी और अपने शिष्यों को भी अपने सिद्धांतों पर चलने के लिए शिक्षित करने लगे थे। इसी कारण इन्हें आदि गुरु शंकराचार्य कहा जाता है।
इनके संन्यास से जुड़ी एक कथा कुछ इस प्रकार है, शंकराचार्य की माता ने अपने इकलौते पुत्र को संन्यासी बनने की आज्ञा नहीं दी थीं। एक दिन नदी के किनारे एक मगरमच्छ ने इनका पैर पकड़ लिया था तब उन्हें एक युक्ति सूझी। उन्होंने इस बात का फायदा उठाया और माँ से कहा कि अगर वे उन्हें संन्यास लेने की आज्ञा नहीं देंगी तो मगरमछ उन्हें खा जाएगा। इस बात से भयभीत होकर माता ने तुरंत इन्हें संन्यासी होने की आज्ञा दे दी। कहते हैं जैसे ही माता ने हाँ की वैसे ही तुरंत मगरमच्छ ने शंकराचार्यजी का पैर छोड़ दिया।
बाद में शंकराचार्य ने गोविन्द स्वामी से संन्यास ग्रहण किया। करीब 4 वर्षों तक इन्होंने अपने गुरु की सेवा की और इस दौरान इन्होंने वैदिक ग्रन्थों को आत्मसात कर लिया था। इतना ही नहीं इस दौरान शंकराचार्य ने बहुत सी यात्राएं भी की। वो केरल से कश्मीर, पुरी से द्वारका, श्रृंगेरी से बद्रीनाथ और कांची से काशी (उत्तरप्रदेश) तक गए।
हिमालय की तराई से नर्मदा-गंगा के तटों तक और पूर्व से लेकर पश्चिम के घाटों तक भी इन्होंने यात्राएं कीं।

शंकराचार्य जी के चार मठ
हिंदू धर्म की स्थापना और प्रचार के लिए आदि शंकराचार्य ने पूरे भारत देश के चार कोनो में मठों की स्थापना की थी।
वेदांत मठ – सबसे पहले दक्षिण भारत में आपने वेदांत मठ की स्थापना श्रंगेरी (रामेश्वरम) में की। इसे ज्ञानमठ भी कहा जाता है। इस मठ के प्रथम मठाधीश आचार्य सुरेश्वरजी थे।
गोवर्धन मठ – पूर्वी भारत (जगन्नाथपुरी) में शंकराचार्य ने दूसरा मठ स्थापित किया था। इस मठ के प्रथम मठाधीश आदि शंकराचार्य के प्रथम शिष्य पद्मपाद हुए।
शारदा मठ – अपने तीसरे मठ की स्थापना पश्चिम भारत (द्वारकापुरी) में शंकराचार्य ने की थी। इसे कलिका मठ भी कहा जाता है। शारदा मठ के प्रथम मठाधीश हस्तामलक (पृथ्वीधर) थे। हस्तामलक शंकराचार्य जी के प्रमुख चार शिष्यों में से एक थे।
बद्रीकाश्रम – शंकराचार्य द्वारा उत्तर भारत में चौथा मठ स्थापित किया गया था। इसे ज्योतिपीठ मठ कहा जाता है। ज्योतिर्मठ के प्रथम मठाधीश आचार्य तोटक बनाए गए थे।

आदि शंकराचार्य के कुछ अनमोल विचार
1. शंकराचार्य जी का मानना था कि मनुष्य को अपना मन हमेशा साफ़ रखना चाहिए। साफ़ और पवित्र मन ही तीर्थ के समान होता है फिर मनुष्य को कहीं बाहर तीर्थ पर जाने की कोई ज़रूरत नहीं होती।
2. आत्मा ही ज्ञान का स्वरुप होता है।
3. आनंद उन्हें मिलता है जो आनंद कि तालाश नहीं कर रहे होते हैं।
4 अगर आप सच से परिचित हैं तो धर्मग्रंथ पढ़ने कि कोई जरूरत नहीं है। सत्य की राह पर चलें।
5. संसार मोह माया का जाल है और मोह से भरा हुआ इंसान एक सपने कि तरह होता है यह तब तक ही सच लगता है जब तक आप अज्ञान की नींद में सो रहे होते हैं। जब नींद खुलती है तो इसकी कोई जगह नहीं रह जाती है।

शंकराचार्य जी की मृत्यु
शंकराचार्य का निधन 32 वर्ष की आयु में हो गया था। ऐसा मानना है कि जब कई वर्षों तक इनके माता पिता को कोई संतान नहीं हुई तो इनके पिता ने भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए उनकी उपासना की थी एक दिन महादेव ने इनके पिता को सपने में दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। तब शिवागुरु ने उनसे ऐसी संतान मांगी जो दीर्घायु हो और जो चारों ओर प्रसिद्ध हो। इस पर महादेव ने कहा कि उनकी दोनों इच्छाएं पूरी नहीं हो सकती। शंकर जी ने दोनों इच्छाओं में से एक ही इच्छा को वरदान स्वरुप देने की बात करते हुए कहा कि या तो संतान के दीर्घायु होने की कामना करो या सर्वज्ञ होने की। यदि वो सर्वज्ञ हुआ तो दीर्घायु नहीं होगा और यदि दीर्घायु हुआ तो सुप्रसिद्ध नहीं होगा। तब शंकराचार्य के पिता ने शिव जी से सर्वज्ञ पुत्र की कामना की थी।



Click it and Unblock the Notifications











