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परशुराम जयंती 2018: जानिये क्यों अपनी ही माता का वध करना पड़ा था परशुराम को
त्रेता युग के मुनि और भगवान विष्णु के छठे अवतार, परशुराम जी की जयंती हर वर्ष अक्षय तृतीया के दिन मनायी जाती है। माना जाता है कि इसी दिन न्याय के देवता श्री परशुराम ने जन्म लिया था इस पर्व को परशुराम द्वादशी भी कहते हैं। हिन्दू धर्म के लोगों के लिए ये दिन बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है।
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को परशुराम जी का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम महर्षि जमदग्नि था और माता का नाम रेणुका था। वे पांच भाई थे। ऐसी मान्यता है कि भगवान परशुराम आज भी जीवित हैं और घोर तपस्या में लीन हैं। परशुराम जी का उल्लेख हमारे धर्मिक ग्रंथों में भी मिलता है जिसके अनुसार वे अहंकारी और दुष्ट हैहय वंशी क्षत्रियों का पृथ्वी से 21 बार संहार कर चुके हैं। वे धरती पर वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे।

माना जाता है कि भारत के अधिकांश गाँव परशुराम जी ने ही बसाये थे। शास्त्रों के अनुसार उन्होंने तीर चलाकर गुजरात से केरल तक समुन्द्र को पीछे की ओर धकेल दिया था। यही वजह है कि परशुराम जी कोंकण, गोवा और केरल में पूजनीय हैं। वे जानवरों की भाषा समझते एवं उनसे बातें भी करते थे, इतना ही नहीं खूंखार जानवर भी उनसे मित्रता कर लेते।
परशुराम जी हमेशा बड़ों का आदर और छोटों से प्यार करते किंतु जब उन्हें क्रोध आता तो उसकी अग्नि से बच पाना मुश्किल हो जाता। स्वयं गणों के स्वामी श्री गणेश उनके क्रोध का शिकार हो चुके हैं। अपने फरसे के प्रहार से इन्होंने गणेश जी का एक दाँत तोड़ दिया था।
आज परशुराम जयंती के शुभ अवसर पर आइए जानते हैं इनके जीवन के कुछ रोचक किस्से।

राम से परशुराम
कहते हैं परशुराम जी को बचपन में उनके माता पिता राम कह कर बुलाते थे। उन्होंने अपने पिता महर्षि जमदग्नि से सीखा था। धनुर्विद्या के लिए उनके पिता ने उन्हें भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा अपने पिता की आज्ञा मान कर परशुराम ने कठोर तप किया।
एक कथा के अनुसार जब समस्त देवी देवता असुरों के अत्याचार से परेशान होकर महादेव के पास गए तो शिव जी ने अपने परम भक्त परशुराम को उन असुरों का वध करने के लिए कहा जिसके पश्चात परशुराम ने बिना किसी अस्त्र शस्त्र के सभी राक्षसों को मार डाला। यह देख भोलेनाथ अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने परशुराम को कई शस्त्र प्रदान किये जिनमें से एक फरसा भी था।
उस दिन से वे राम से परशुराम बन गए।

श्री गणेश पर कर दिया वार
पौराणिक कथाओं में इस बात का उल्लेख मिलता है कि परशुराम ने ही गणेश जी का एक दांत तोडा था। इसके पीछे की कथा कुछ इस प्रकार है एक बार परशुराम कैलाश शिव जी मिलने पहुंचे किंतु महादेव घोर तपस्या में लीन थे इसलिए गजानन ने उन्हें भोलेनाथ से मिलने नहीं दिया। इस बात से क्रोधित होकर परशुराम ने उनपर अपना फरसा चला दिया। क्योंकि वह फरसा स्वयं शंकर जी ने उन्हें दिया था इसलिए गणपति उसका वार खाली नहीं जाने देना चाहते थे। जैसे ही परशुराम ने उन पर वार किया उन्होंने उस वार को अपने दांत पर ले लिया जिसके कारण उनका एक दांत टूट गया तब से गणेश जी एकदन्त भी कहलाते है।

अपनी ही माता का किया वध
कहते हैं परशुराम अपने माता पिता के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। उनकी आज्ञा का पालन करना उनका परम धर्म था। एक बार उनकी माता रेणुका नदी में जल भरने के लिए गयी वहां गन्धर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार करता देख हवन हेतु जल लेने गई रेणुका कुछ देर तक वहीं रुक गयीं। जिसके कारण उन्हें घर वापस लौटने में देर हो गयी। उनके पति जमदग्नि ने अपनी शक्तियों से उनके देर से आने का कारण जान लिया और उन्हें अपनी पत्नी पर बहुत गुस्सा आने लगा। जब रेणुका घर पहुंची तो जमदग्नि ने अपने सभी पुत्रों को उसका वध करने के लिए कहा।
किन्तु उनका एक भी पुत्र साहस नहीं कर पाया। तब क्रोधवश जमदग्नि ने अपने चार पुत्रों को मार डाला। उसके बाद पिता की आज्ञा का पालन करते हुए परशुराम ने अपनी माता का वध कर दिया। अपने पुत्र से प्रसन्न होकर परशुराम ने उसे वरदान मांगने को कहा। परशुराम ने बड़ी ही चतुराई से अपने भाइयों और माता को पुनः जीवित करने का वरदान मांग लिया।

क्षत्रियों का संहार
क्षत्रियों के राजा कार्तवीर्य (सहस्त्रार्जुन) परशुराम की गाय कामधेनु को बलपूर्वक ले गया। इस बात से क्रोधित परशुराम ने उसका वध कर दिया था। अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए कार्तवीर्य के पुत्रों ने महर्षि जमदग्नि की हत्या कर दी थी। अपने पति के साथ रेणुका भी सती हो गयी। यह सब देख परशुराम ने यह प्रण लिया था कि वह पृथ्वी से सभी क्षत्रियों का नाश कर देंगे।
परशुराम ने पूरे वेग से महिष्मती नगरी पर आक्रमण कर दिया और उस पर अपना अधिकार कर लिया। उन्होंने अपने पिता का श्राद्ध सहस्त्रार्जुन के पुत्रों के रक्त से किया। उन्होंने एक के बाद एक पूरे इक्कीस बार इस पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश किया।
जब पृथ्वी की रक्षा के लिए कोई भी क्षत्रिय नहीं बचा तो ऋषि कश्यप ने परशुराम को पृथ्वी छोड़कर जाने के लिए कह दिया जिसके बाद वे महेन्द्रगिरि पर्वत पर चले गए। वहां उन्होंने कई वर्षों तक कठोर तपस्या की जिसके कारण आज उस स्थान को उनका निवास्थल कहा जाता है।
महेन्द्रगिरि उड़ीसा के गजपति जिले में स्थित है।



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