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Ratha Saptami: अचला सप्तमी की व्रत कथा से जानें भगवान सूर्य का पराक्रम
माघ महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को रथ सप्तमी अथवा अचला सप्तमी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इसी दिन भगवान सूर्य सात घोड़ों के रथ पर सवार होकर प्रकट हुए थे। यह दिन सूर्य देव के जन्मोत्सव या सूर्य जयंती के रूप में भी मनाई जाती है। कई स्थानों पर इसे सूर्य सप्तमी और आरोग्य सप्तमी के नाम से जाना जाता है। लोगों की आस्था है कि इस दिन भगवान सूर्य की आराधना करने से जातक के जीवन में धन-धान्य, खुशहाली और संतान सुख की प्राप्ति होती है। अचला सप्तमी के साथ जुड़ी प्रचलित पौराणिक कथा के बारे में जानते हैं।

अचला सप्तमी शुभ मुहूर्त-
सप्तमी तिथि आरंभ: 18 फरवरी 2021 (गुरूवार) को सुबह 8 बजकर 17 मिनट से
सप्तमी तिथि समाप्त: 19 फरवरी 2021 (शुक्रवार) सुबह 10 बजकर 58 मिनट तक
सप्तमी के दिन अरुणोदय: सुबह 6 बजकर 32 मिनट
सप्तमी के दिन अवलोकनीय (दिखने योग्य) सूर्योदय: सुबह 6 बजकर 56 मिनट

अचला सप्तमी से जुड़ी प्रचलित पौराणिक कथा
रथ सप्तमी अथवा अचला सप्तमी की पौराणिक व्रत कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र शाम्ब को अपने शारीरिक बल पर बहुत अभिमान हो गया था। एक बार दुर्वासा ऋषि भगवान श्रीकृष्ण से मिलने आए। वे बहुत अधिक दिनों तक तप करके आए थे और इस वजह से उनका शरीर बहुत दुर्बल हो गया था।
शाम्ब उनकी दुर्बलता को देखकर जोर-जोर से हंसने लगा और अपने अभिमान के चलते उनका अपमान कर दिया। तब दुर्वासा ऋषि अत्यंत क्रोधित हो गए और शाम्ब की धृष्ठता को देखकर उसे कुष्ठ होने का श्राप दे दिया।
शाम्ब की यह स्थिति देखकर श्रीकृष्ण ने उसे भगवान सूर्य की उपासना करने को कहा। पिता की आज्ञा मानकर शाम्ब ने भगवान सूर्य की आराधना करना प्रारंभ किया, जिसके फलस्वरूप कुछ ही समय पश्चात उसे कुष्ठ रोग से मुक्ति प्राप्त हुई।

अचला सप्तमी को लेकर प्रचलित एक अन्य कथा
अचला सप्तमी की एक कथा के अनुसार, इंदुमती नाम की एक गणिका थी। उसने वशिष्ठ मुनि के पास जाकर मुक्ति पाने का उपाय पूछा। मुनि ने गणिका को माघ महीने की सप्तमी को अचला सप्तमी का व्रत करने के लिए कहा। गणिका ने मुनि के बताए अनुसार व्रत किया। इससे मिले पुण्य से जब उसने देह त्यागा, तब उसे इन्द्र ने अप्सराओं की नायिका बना दिया।



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