अंगारकी चतुर्थी: गणेश जी की पूजा में भूलकर भी न करें यह काम

Posted By: Rupa Shah
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पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है यह चतुर्थी एक माह में दो बार आती हैं। इस दिन प्रथम पूजनीय भगवान श्री गणेश की पूजा अर्चना की जाती हैं। जब यह चतुर्थी मंगलवार को पड़ती हैं तो इसे अंगारकी चतुर्थी कहा जाता हैं और अमावस्या के बाद आने वाली चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता हैं।

हिन्दू कैलेंडर के हर चंद्रमा में कृष्ण पक्ष के चौथे दिन यह त्यौहार मनाया जाता हैं। आपको बता दें 2018 की पहली अंगारकी चतुर्थी वैशाख कृष्ण तृतीया, 3 अप्रैल को हैं। ऐसी मान्यता हैं कि इस दिन पूजा करने से गौरी पुत्र गणेश अपने भक्तों के सभी दुखों का नाश कर उन्हें आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

Vikata Sankashti Vrat/Chaturthi

आइए जानते हैं क्या हैं इस व्रत की विधि और इसका महत्व

क्यों कहतें हैं अंगारकी चतुर्थी

संकष्टी का अर्थ होता है कठिन समय से मुक्ति पाना और अंगारकी चतुर्थी को बहुत ही शुभ माना जाता हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजन करने से पूरे वर्ष की चतुर्थी का फल प्राप्त हो जाता हैं। माना जाता है कि मंगल देव ने कठिन तपस्या करके विघ्नहर्ता श्री गणेश को प्रसन्न किया था जिसके बाद उन्होंने मंगल देव को वरदान दिया थी की मंगलवार को पड़ने वाली चतुर्थी को अंगारकी चतुर्थी के नाम से जाना जाएगा। शास्त्रों में मंगल देव को अंगारक कहा गया हैं।

अंगारकी चतुर्थी की पूजा विधि

अन्य किसी भी पूजा और व्रत की तरह इस अंगारकी चतुर्थी के भी कुछ विशेष नियम हैं। इस दिन सूरज उगने से पहले ही स्नान कर लें। ततपश्चात व्रत का संकल्प लें और गणेश जी की पूजा करें। पूरे दिन फल, साबूदाना और दूध के अलावा और कुछ भी न खाएं। शाम को पूजा में तिल और गुड़ के लड्डू, फूल, कलश में पानी, चंदन, धूप, केला या नारियल प्रसाद के तौर पर रखें। पूजा में गणेश जी की मूर्ति के साथ देवी दुर्गा की मूर्ति रखना न भूलें। माना जाता है कि इस दिन गणेश जी की पूजा के साथ देवी माँ की पूजा करना अत्यंत शुभ होता हैं।

इतना ही नहीं इस पवित्र अवसर पर चंद्र दर्शन को भी बहुत ही शुभ माना जाता हैं। चन्द्र दर्शन के बाद पूजा कर व्रत कथा पढ़ी जाती हैं। इसके बाद ही व्रत पूर्ण होता हैं।

पूजा में इस मंत्र का करें जाप

गजाननं भूत गणादि सेवितं, कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणम्।

उमासुतं शोक विनाशकारकम्, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्।।

अंगारकी चतुर्थी का महत्व

ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से गजानन बहुत ही प्रसन्न होतें हैं। उनके आशीर्वाद से मनुष्य के सभी कार्य बिना किसी बाधा के पूर्ण हो जातें हैं और उसके घर परिवार में सुख शांति और समृद्धि बनी रहती हैं। इस पूजा के प्रभाव से मंगल दोष से पीड़ित जातकों को भी सारे कष्टों और दुखों से मुक्ति मिल जाती हैं।

Vikata Sankashti Vrat/Chaturthi

भूलकर भी न करें ये काम

गणेश जी की पूजा में भूलकर भी तुलसी के पत्ते का प्रयोग न करें क्योंकि स्वयं गणपति ने ही उन्हें अपनी पूजा से बहिष्कृत कर दिया था। कहतें हैं गजानन ने आजीवन अविवाहित रहने का फैसला लिया था। उन्हें लगता था कि उनका ऐसा रूप देखकर कोई भी स्त्री उनसे विवाह नहीं करेगी। एक कथा के अनुसार देवी तुलसी गौरी पुत्र से विवाह करना चाहती थी लेकिन उन्होंने बड़े ही आदरपूर्वक उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। किन्तु तुलसी जी को यह उनका अपमान लगा और क्रोध में आकर उन्होंने गणपति को श्राप दे दिया कि उनका एक नहीं बल्कि दो दो स्त्रियों से विवाह होगा। माना जाता है कि तुसली जी के श्राप के कारण ही लम्बोदर का विवाह रिद्धि और सिद्धि दोनों से हुआ था।

कहतें हैं तुलसी जी के श्राप से गणेश जी भी बहुत क्रोधित हो गये और उन्होंने अपनी पूजा से तुलसी जी को बहिष्कृत कर दिया। इस वजह से गणपति की पूजा में तुलसी का प्रयोग वर्जित माना गया हैं।

अंगारकी चतुर्थी व्रत कथा

पृथ्वीदेवी ने महामुनि भारद्वाज के जपापुष्प तुल्य अरुण पुत्र का पालन पोषण किया। जब वो 7 वर्ष का हुआ तो उन्होंने उसे महर्षि के पास पहुंचा दिया। महिर्षि ने उसे वेद-शास्त्रादि का अध्ययन कराया। फिर उन्होंने अपने पुत्र को गणपति मंत्र देकर उसे गणेशजी को प्रसन्न करने के लिए उनकी आराधना करने को कहा।

जिसके पश्चात वह बालक गंगाजी के तट पर जाकर प्रभु गणेशजी का ध्यान करते हुए भक्तिपूर्वक उनके मंत्र का जप करने लगा। वह निराहार रहकर एक सहस्र वर्ष तक गणेशजी के ध्यान के साथ उनका मंत्र जपता रहा।

माघ कृष्ण चतुर्थी को चन्द्रोदय होने पर गणेश जी प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उन्होंने मुनिपुत्र को वरदान मांगने को कहा। इस पर वह बालक बोला 'प्रभु! आज आपके दुर्लभ दर्शन कर मैं कृतार्थ हो गया। मेरी माता पर्वतमालिनी पृथ्वी, मेरे पिता, मेरा तप, मेरे नेत्र, मेरी वाणी, मेरा जीवन और जन्म सभी सफल हुए। दयामय! मैं स्वर्ग में निवास कर देवताओं के साथ अमृतपान करना चाहता हूं। मेरा नाम तीनों लोकों में कल्याण करने वाला 'मंगल' प्रख्यात हो।'

उसने आगे कहा, 'करुणामूर्ति प्रभु! मुझे आपका भुवनपावन दर्शन आज माघ कृष्ण चतुर्थी को हुआ हैं अतएव यह चतुर्थी नित्य पुण्य देने वाली एवं संकटहारिणी हो। सुरेश्वर! इस दिन जो भी व्रत करे, आपकी कृपा से उसकी समस्त कामनाएं पूर्ण हो जाया करें।'

तब गणेश जी बोलें, मेदिनीनंदन! तुम देवताओं के साथ सुधापान करोगे। तुम्हारा 'मंगल' नाम सर्वत्र विख्यात होगा। तुम धरणी के पुत्र हो और तुम्हारा रंग लाल हैं, अत: तुम्हारा एक नाम 'अंगारक' भी प्रसिद्ध होगा और यह तिथि 'अंगारक चतुर्थी' के नाम से प्रख्यात होगी। पृथ्वी पर जो मनुष्य इस दिन मेरा व्रत करेंगे, उन्हें एक वर्षपर्यंत चतुर्थी व्रत करने का फल प्राप्त होगा। निश्चय ही उनके किसी कार्य में कभी विघ्न उपस्थित नहीं होगा।'

लम्बोदर ने कहा, 'तुमने सर्वोत्तम व्रत किया हैं, इस कारण तुम अवंती नगर में परंतप नामक नरपाल होकर सुख प्राप्त करोगे। इस व्रत की अद्भुत महिमा है। इसके कीर्तन मात्र से मनुष्य की समस्त कामनाओं की पूर्ति होगी।' ऐसा कहकर गजमुख अंतर्ध्यान हो गए।

पृथ्वी पुत्र ने मंगलवारी चतुर्थी के दिन व्रत करके श्री गणेशजी की आराधना की थी इसलिए यह तिथि 'अंगारक चतुर्थी' के नाम से प्रख्यात हुई।

English summary

Vikata Sankashti Vrat/Chaturthi

The Chaturthi that comes after the full moon or the Pournami is known as Sankashti Chaturthi and the one that comes after the Amavasya is called the Vinayaka Chaturthi.