भारत-पाकिस्‍तान बॉर्डर पर है लैला मजनूं की मजार, हर साल मन्‍नतें मांगने आते है हजारों आशिक यहां..

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जब दो आशिकों या प्रेमियों का नाम लिया जाता है तो लैला-मजनू का नाम सबसे पहने लिया जाता है। इन दोनों ने अपनी मोहब्‍बत के लिए दुनिया भर के सितम सहें। लेकिन इसके बाद भी जीते जी तो इन्‍हें मोहब्‍बत के दुश्‍मनों ने मिलने नहीं दिया लेकिन मौत के बाद इन्‍हें कोई एक दूसरे से जुदा न कर पाया।

राजस्‍थान का ये श्रापित मंदिर जहां रात होते ही इंसान बन जाते है पत्‍थर

कहते हैं कि वे दोनों मोहब्बत के लिए क़ुर्बान हो गए और दुनिया से दूर आसमान में कहीं मिले। आज सैकड़ों सालों के बाद भी लैला-मजनूंं की प्रेम कहानी अमर है।

एकमात्र हिंदू मंदिर जहां लोग आने से डरते हैं

कहा जाता है कि दोनों ने अपनी ज़िंदगी के आखिरी लम्हे पाकिस्तान बॉर्डर से महज़ 2 किलोमीटर दूर राजस्थान की ज़मीन पर ही गुजारे थे। उनकी याद में अनूपगढ़ के बिंजौर गांव में 'लैला-मजनू' की मज़ार बनी है। हर साल यहां हजारों प्रेमी जोड़े अपनी मोहब्‍बत की सलामती के लिए इस मजार में मन्‍नतें मांगने आते हैं।

इस जगह हुई थी इनकी मौत

इस जगह हुई थी इनकी मौत

लोगों का मानना हैं कि लैला-मजनू सिंध प्रांत के रहने वाले थे। उनकी मौत यहीं पाकिस्‍तान बॉर्डर से महज 2 किलोमीटर दूर राजस्‍थान के गंगानगर जिले के अनूपगढ़ में हुई थी। कुछ लोगों का मानना है कि लैला के भाई को जब दोनों के इश्क का पता चला, तो उसे बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने क्रूर तरीके से मजनू की हत्या कर दी।

नहीं मालूम कैसे हुई मौत

नहीं मालूम कैसे हुई मौत

लैला को जब इसका पता चला तो वह मजनू के शव के पास पहुंची और जान दे दी। कुछ लोगों का मत है कि घर से भाग कर दर-दर भटकने के बाद, वे यहां तक पहुंचे और प्यास से उन दोनों की मौत हो गई। वहीं कुछ लोग कहते है कि परिवार वालों और समाज से दुखी होकर उन्होंने एक साथ आत्महत्या कर ली।

ए‍क काहानी ये भी है

ए‍क काहानी ये भी है

लैला मजनूं को अलग करने के लिए लैला की शादी किसी और से करवा दी गई थी। मजनू इस गम में पागल हो गया और उसने पागलपन में कई कविताएं लिख डाली। इसके बाद लैला पति के साथ ईराक चली गई, जहां कुछ ही समय के बाद बीमार होने की वजह से वो मर गई। इसके बाद लैला की कब्र के पास ही मजनूं की लाश बरामद हुई। मरते हुए मजनू ने अपनी कविता के तीन चरण यहीं एक चट्टान पर लिख रखे थे। जो उसका लैला के नाम आखिरी पैगाम था।

मेले में आते है सभी धर्म के लोग

मेले में आते है सभी धर्म के लोग

हर साल 15 जून को लैला-मजनू की मज़ार पर दो दिन का मेला लगता है, जिसमें बड़ी संख्या में हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के प्रेमी और नवविवाहित जोड़े आते हैं और अपने सफल वैवाहिक जीवन की कामना करते हैं। खास बात यह है कि मेले में सिर्फ़ हिंदू या मुस्लिम ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में सिख और ईसाई भी शरीक होते हैं। यह पवित्र मज़ार प्रेम करने वालों के लिए बेहद ख़ास है।

लैला-मजनू की कहानी

लैला-मजनू की कहानी

यह उस समय की काहानी है जब सिंध में अरबपति शाह अमारी के बेटे कैस (मजनू) और लैला नाम की लड़की को एक दूसरे से प्‍यार हो गया और जिसका अंत मौत के साथ हुआ। उनके अमर प्रेम के चलते ही लोगों ने दोनों के नाम के बीच में ‘और' लगाना मुनासिब नहीं समझा और दोनों हमेशा के लिए ‘लैला-मजनू' के रूप में ही अमर हो गए।

बॉर्डर पर भी बनाई है 'मजनू पोस्ट'

बॉर्डर पर भी बनाई है 'मजनू पोस्ट'

इन महान प्रेमियों को भारतीय सेना ने भी सम्मान दिया है। भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित एक पोस्ट को बीएसएफ की ‘मजनू पोस्ट' नाम दिया है। कारगिल युद्ध से पहले मज़ार पर आने के लिए पाकिस्तान से खुला रास्ता था, लेकिन इसके बाद आतंकी घुसपैठ के चलते इसे बंद कर दिया गया है।

English summary

Laila-Majnu Ki Mazar: The Tomb of Eternal Love

Laila-Majnu Ki Mazar is a mausoleum where Laila and Majnu is said to have died. Many legends are told about this tomb in Binjaur Village in Anoopgarh city.
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