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आखिर किससे बचने के लिए अमेरिका भाग गए थे BJP नेता सुब्रमण्यम स्वामी?
अपने पिता को अपना आदर्श मानने वाले सुब्रमण्यम स्वामी अच्छा गणितज्ञ बनना चाहते थे पर वो राजनीति में कमाल करने लगे। स्वामी से जुड़े कई दिलचस्प किस्से हैं जिसमें उनकी खूबी और उनका जुझारूपन दोनों दिखता है।
स्वामी का जन्म 15 सितंबर 1939 को चेन्नई में हुआ था। गणित के अच्छे जानकार उनके पिता भारत सरकार में डायरेक्टर के पद पर थे। पहले स्वामी की पढ़ाई लिखाई दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज से हुई। उन्होंने गणित विषय में ऑनर्स की डिग्री ली। फिर मास्टर डिग्री के लिए इंडियन स्टेटिस्टिकल इंस्टिट्यूट कोलकाता चले गए। आगे की पढ़ाई विदेश में हुई। अब स्वामी हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी चले गए। जब लौटे तो अर्थशास्त्र में पीएचडी की डिग्री लेकर लौटे।

साधारण से दिखने वाले सुब्रमण्यम स्वामी असल में असाधारण व्यक्तित्व के धनी हैं। जिनकी क्षमताओं का अंदाज़ा लगाना बहुत मुश्किल है। प्रतिभाशाली सुब्रमण्यम स्वामी गणित, अर्थशास्त्रऔर कानून विषय के अच्छे जानकार हैं। उनकी प्रतिभा का अंदाज़ा इसी बात से लगा सकते हैं कि स्वामी ने मात्र 24 साल की उम्र में हॉर्वर्ड विश्ववद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल कर ली। फिर मात्र 27 की उम्र में हॉर्वर्ड में ही स्टूडेंट को गणित पढ़ाने लगे थे। बाद में 1968 में महान अर्थशास्त्री अमृत्य सेन ने उन्हें दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में पढ़ाने का निमंत्रण दिया। लेकिन वो दिल्ली लौटकर साल 1969 में आईआईटी से जुड़ गए।

सत्तर के दशक शुरू होते ही स्वामी के अलग-अलग सेमीनारों में दिए आर्थिक सुधार संबंधी विपरीत बयान से इंदिरा गांधी नाराज होने लगी। इसका खामियाजा उन्हें नौकरी से निकलकर भुगतना पड़ा। 1972 में इंदिरा सरकार ने उन्हें आईआईटी दिल्ली की नौकरी से बाहर कर दिया। इसके बाद स्वामी का कद काफी बढ़ गया। हर तरफ ये चर्चा थी कि उनके बयानों पर प्रधानमंत्री भी रिएक्ट करती हैं। इधर स्वामी ने अदालत का सहारा लिया। 1991 में वो जीत भी गए। लेकिन उसके बाद स्वामी बस एक दिन के लिए आईआईटी दिल्ली गए और इस्तीफा देकर लौट आए।

पहली बार उनका ये गुण कोलकाता में लोगों के सामने आया। पीसी महालानोबिस भारतीय सांख्यिकी इंस्टीच्यूट कोलाकाता के डायरेक्टर थे, कहा जाता था कि महालानोबिस स्वामी के पिता के प्रतिद्वंदी थे। इसी कारण स्वामी को खराब ग्रेड देते थे। इसके बाद उन्होंने एक पत्र लिखकर बताया कि महालानोबिस की सांख्यिकी गणना का तरीका सही नहीं है। बाद में उनका ये विद्रोही गुण लोगों को सियासत में भी दिखने लगा।

इधर स्वामी राजनीति में प्रवेश कर चुके थे। साल 1974 में नानाजी देशमुख ने स्वामी को जनसंघ की ओर से राज्य सभा भेज दिया। कुछ दिन बाद देश में आपातकाल लग गया। लेकिन 19 महीने के दौर में सरकार उन्हें गिरफ़्तार करने में असफल रही।
आपातकाल के दौरान स्वामी गिरफ्तारी से बचने के लिए या तो गुजरात में रहते थे या फिर तमिलनाडु में। दोनों राज्यों में कांग्रेस की सरकार नहीं थी। गुजरात में स्वामी अक्सर तत्कालिन मंत्री मकरंद देसाई के घर जाकर रूकते थे और नरेंद्र मोदी उन्हें देसाई के घर से लाने और छोड़ने का काम करते थे। गिरफ्तारी से बचने के लिए स्वामी अमेरिका भाग गए । इधर पुलिस वाले उनके घर पर लगातार छापेमारी कर रही थी... कहा जाता है कि घर छोड़कर घर का सारा सामान पुलिस उठाकर ले गई। तमाम तकलीफों और गिरफ्तारी की डर के बावजूद स्वामी किसी तरीके से दिल्ली लौट आए ... फिर किसी तरह सिख के वेश में संसद में एक शोक सभा के दौरान पहुंचकर अपनी बात कही और दिल्ली से बाहर चले गए।

इसी बाच में 1977 में स्वामी जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे। फिर 1990 के बाद वो इसी जनता पार्टी के अध्यक्ष भी बने। ये वही पार्टी थी जिसे 11 अगस्त 2013 को बीजेपी में विलय कर दिया गया।
90 के दशक की शुरूआत में देश की राजनीति में काफी अस्थिरता थी। चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री बने तो स्वामी को उन्होंने वाणिज्य और कानून मंत्री का पद दिया। ये वही वक्त था जब उन्होंने आर्थिक सुधारों की नींव रखी। इधर राजनीति में भी उनका कद काफी बड़ा हो चला था। तभी तो नरसिम्हा राव की सरकार के दौरान विपक्ष में होते हुए भी उन्हें मंत्री पद का रैंक दिया गया था।
किसी जमाने में आकर सोनिया और राहुल के विरोध में खड़े सुब्रमण्यम स्वामी कभी राजीव गांधी के अच्छे दोस्त रहे हैं। बोफोर्स कांड के दौरान स्वामी सार्वजनिक तौर पर राजीव के पक्ष में खड़े थे। ऐसा नहीं कि स्वामी ने सिर्फ सोनिया गांधी को ही मुश्किल में डाला। उन्होंने वाजपेयी सरकार के दौरान भी सरकार गिराने की कोशिश की थी ... इसके लिए उन्होंने सोनिया और जयललिता की मुलाकात भी कराई। ये अलग बात है कि इसमें वो सफल नहीं हो सके। बाद में वो हमेशा गांधी परिवार के खिलाफ ही खड़े नजर आए।
लालकृष्ण आडवाणी हमेशा से सुब्रमण्यम स्वामी को बीजेपी में वापस चाहते थे। हालांकि वाजपेयी के रहते वे कभी बीजेपी में पैर नहीं जमा पाए। लेकिन 11 अगस्त 2013 को ये संभव हो पाया। 2014 के चुनावों में उन्होंने नरेंद्र मोदी के लिए शानदार प्रचार किया।
कहा जाता है कि स्वामी का परिवार धर्मनिरपेक्ष परिवार है। उनकी पत्नी पारसी हैं। भाभी ईसाई, दामाद मुस्लिम और बहनोई यहूदी। उनके हिस्से में कई अच्छी बातें हैं। जिसका जिक्र वक्त-वक्त पर होता आया है। 1981 में दोबारा मानसरोवर यात्रा स्वामी ने ही शुरू कराया था।
स्वामी आए दिन चर्चाओं में रहते हैं। कई मामलों में कोर्ट तक जा पहुंचे स्वामी कांग्रेस पार्टी को खासकर सोनिया और राहुल को नेशनल हेराल्ड अखबार के मामले में घेर लिया है। ये पूरा मामला अभी कोर्ट में है... भ्रष्टाचार से लेकर गड़बड़ी तक के ऐसे कई और भी मामले और मसले हैं जिसे लेकर स्वामी लगाचार चर्चाओं में बने रहते हैं।
सियासत से लेकर शिक्षा की दुनिया तक में स्वामी अघोषित असाधारण प्रतिभा के नाम बन चुके हैं। यही उनकी काबिलियत का प्रमाण है कि लाखों बुराई और हजारों आरोपों के बाद भी उनके विरोधी उन्हें पूर्ण रूप से नकारते नहीं हैं।



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