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नवजात शिशुओं को होती हैं त्वचा संबंधित ये समस्याएं
अभिभावकक होने के नाते हमें अपने शिशु से जुड़ी हर बीमारी और परेशानी की जानकारी होना आवश्यक है। शिशु के जन्म के कुछ साल तक उसे इंफेक्शन और किसी रोग के होने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है।
इसलिए आपको उसे ऐसी किसी मुश्किल से बचाने के लिए आपको तैयार रहना चाहिए। साथ ही आपको अपने शिशु में इन रोगों और इंफेक्शन को पहचानने का भी पता होना चाहिए।
शरीर में त्वचा सबसे बड़ा अंग होता है। इसके अलावा ये ही सबसे पहला रक्षा कवच होता है जो अनके बीमारियों और इंफेक्शन से हमें बचाता है।
बाहरी दुनिया से प्रभावित होकर त्वचा पर कई तरह का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और त्वचा की अनेक तरह की बीमारियों को समझ पाना बहुत मुश्किल होता है।
शिशु में भी त्वचा से जुड़ी कई बीमारियों और इंफेक्शन का खतरा रहता है। अगर इनका पता समय रहते ही लगा लिया जाए तो शिशु को इसके घातक प्रभावों से बचाया जा सकता है।
तो चलिए एक नज़र डालते हैं शिशुओं में होने वाली त्वचा संबंधित बीमारियों पर।

1. मुहांसे
शिशुओं को भी एक्ने की समस्या होती है। मां के हार्मोन में बदलाव या शिशु के जन्म लेने के बाद अचानक मौसम में आए बदलाव के कारण ऐसा हो सकता है।
वहीं कुछ बच्चों को जन्म के समय ही एक्ने की समस्या हो जाती है जैसे कि जन्म के पहले सप्ताह में ही शिशु को एक्ने हो सकता है। एक्ने गालों पर सबसे ज्यादा रहता है लेकिन ये शिशु के माथे, कमर और चिन पर भी हो सकता है।
सलाइवा और सख्त कपड़ों के कारण भी शिशु को एक्ने की समस्या हो सकती है। डिटर्जेंट भी एक्ने का कारण बन सकता है।
एक्ने हमेशा अपने आप ही ठीक होता है लेकिन कभी-कभी ये ठीक होने में ज्यादा समय ले लेता है।

2. चिकन पॉक्स
बच्चों और नवजात शिशुओं में चिकन पॉक्स देखा जाता है। इसमें सिरदर्द, बुखार, भूख में कमी, मितली और मांसपेशियों में दर्द जैसे लक्षण सामने आते हैं। इस वजह से शिशु की त्वचा में दरार आने लगती है। इसमें दर्द तो नहीं होता लेकिन खुजली की शिकायत जरूर रहती है।
चिकन पॉक्स एक वायरल बीमारी है और ये कुछ दिनों में ठीक हो जाती है। आपको अपने बच्चे को डॉक्टर के पास जरूर ले जाना चाहिए और उनके द्वारा बताई गई दवा से बुखार में कमी आती है। कैलामाइन लोशन से खुजली को कम किया जा सकता है। अपने बच्चे को ज्यादा से ज्यादा तरल पदार्थ दें और समय-समय पर उसे खिलाते रहें।

3. क्रैडल कैप
जन्म के बाद नवजात शिशुओं में ये आम समस्या होती है। डैंड्रफ होना इसका मुख्य लक्षण माना जाता है। त्वचा पर लाल रंग के पैच पड़ जाते हैं और बाद में ये पैव पीले और चिपचिपे लगने लगते हैं। बाद में ये पैच सूख जाते हैं।
शिशु के सिर की त्वचा के अलावा ये समस्या उसके चेहरे, नैपी एरिया, नाक, गर्दन और बगल में भी देखी जाती है।
हाथों को साफ करके अपने शिशु की त्वचा पर मलें और किसी ब्रश से नरमी से इन्हें साफ करें।

4. एग्जिमा
त्वचा की सूखी और लाल जगह पर दरार आना या खुजली होना एग्जिमा का लक्षण है। कभी-कभी इसमें से खून या पानी भी निकलता है। ये हाथों, कोहनी, गले, चेहरे और घुटनों के पीछ हो सकता है।
आपके शिशु को शुरुआती स्तर में ही बचाव की जरूरत होती है। समय के साथ एग्जिमा से छुटकारा मिल जाता है।

5. खसरा
नाक बहना, बुखार, आंखों में सूजन, खांसी और शिशु के मुंह में सफेद निशान होना खसरे के कुछ लक्षण हैं।
खसरा होने के कुछ दिन बाद बच्चे के चेहरे, गर्दन और कानों के आसपास लाल रंग के निशान आने लगते हैं। ये 5-6 दिन तक रहते हैं और इनमें बहुत ज्यादा खुजली होती है।
अगर आपके बच्चे को खसरा हो गया है तो तुंरत डॉक्टर के पास जाएं। ये बीमारी वायरस की वजह से होती है और ये अपने आप ही दूर हो जातीहै। बुखार के लिए अपने शिशु को पैरसिटामॉल दे सकते हैं। इस बीमारी से बचने के लिए अपने शिशु को ज्यादा से ज्यादा तरल पदार्थ दें।

6. मिलिया
नवजात शिशु के चेहरे पर सफेद रंग के निशान होना ही मिलिया का लक्षण है। इन सफेद दागों को ही मिलिया कहा जाता है। इसमें गालों, माथे, चिन, नाक और कानों के आसपास छोटे सफेद धब्बे पड़ने लगते हैं।
मिलिया को लेकर चिंता करने की जरूरत बिलकुल नहीं है ये 6 सप्ताह के भीतर अपने आप ठीक हो जाते हैं।

7. नैपी रैश
शिशु के यौन अंग के आसपास लाल रंग के चकत्ते पड़ जाते हैं। ये सूखे और गीले दोनों तरह के हो सकते हैं।
शिश के जन्म लेने के शुरुआती पहले साल में नैपी रैश की समस्या बहुत आम होती है। अगर शिशु की त्वचा संवेदनशील है तो ऐसा होने की संभावना बढ़ जाती है। कुछ डिटर्जेंट और कपड़ों की वजह से भी नैपी रैश होता है।
समय-समय पर बच्चे की नैपी बदलती रहें और बच्चे की साफ-सफाई पर भी पूरा ध्यान दें।



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