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क्या चूडि़यां पहनने से प्रसव में आसानी होगी ?
भारत में गर्भवती महिलाओं के लिए बच्चे के जन्म से पहले गोद भराई की रस्म एक परम्परा है। वैसे, गर्भावस्था के दौरान कई परम्पराएं होती है जो सभी को उत्सव के रंग में डुबो देती है और लगने लगता है कि घर - परिवार के कोई नया सदस्य आने वाला है। इनमें से कई रीति - रिवाज, मां और बच्चे के स्वास्थ्य के लिए होते हैं। इन भी कार्यक्रमों के पीछे एक वैज्ञानिक कारण होता है। इन सभी कार्यक्रमों में से एक कार्यक्रम होता है - बैंगल सेरेमनी यानि चूडि़यां पहनाने का उत्सव। जब भी आपके जीवन में कोई नई खुशी आती है तो इस रिवाज को किया जाता है।
हाल ही में हुए एक अध्ययन में पता चला है कि अगर गर्भवती महिला को हाथों में ढ़ेर सारी चूडि़यां पहना दी जाएं तो इससे उसे प्रसव में आसानी होगी। इस परम्परा को सीमांथम भी कहा जाता है। इस रिवाज में गर्भवती महिला के माता - पिता सभी बच्चों वाली महिलाओं को बुलाते है और गर्भवती महिला के हाथों में उसे एक - एक जोड़ा चूहियां पहनाने के लिए कहते है। इसके अलावा भी ऐसी ही और प्रथाएं होती है, जिनमें से कुछ का वैज्ञानिक महत्व है और कुछ सिर्फ मिथक हैं। जब भी आप गर्भवती होती है तो प्रसव होने के आसान तरीकों की तरफ ध्यान देती है, यहां कुछ ऐसे ही कॉमन रिवाज के बारे में बताया जा रहा है जिन्हे फॉलों से आसानी से प्रसव होता है और इनका वैज्ञानिक महत्व भी है : -
चूड़ी समारोह : बच्चे के जन्म से पहले महिला की गोद भराई की रस्म की जाती है, इसमें गर्भवती महिला को ढ़ेर सारी चूडियां पहनाई जाती है और मां - बच्चे को आर्शीवाद दिया जाता है। इस बारे में प्रशांथ हॉस्पीटल की डा. गीथा हरिप्रिया का कहना है कि चूडि़यों से बच्चों को एक्कास्टिक स्टुमलाई प्रदान होते है और उसमें हलचल होती है, जिससे होने में प्रसव आसानी रहती है।
प्रसव होने की जगह : पहली बार प्रसव होने के दौरान महिला घबराई होती है, ऐसे में उसे अपने माता - पिता के साथ सहजता महसूस होती है। इसीलिए माना जाता है कि पहली डिलीवरी मायके में होनी चाहिए ताकि लड़की को ड़र न लगे और वह अपने घरवालों के साथ आराम से रह सकें।
यात्रा का समय निर्धारण : माना जाता है कि गर्भावस्था के दौरान सातवें या आठवें महीने में लड़की को मायके आ जाना चाहिए और प्रसव के तीसरे महीने के बाद ही ससुराल वापस जाना चाहिए। इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण यह है कि सातवें या आठवें महीने में यात्रा करने से एबॉर्शन का खतरा नहीं रहता और तीन महीने बाद आने तक सेक्सुअल रिलेशन से बचा जा सकता है जिससे महिला का शरीर फिर से मजबूत हो जाता है।
संगीत सुनें : अध्ययन से यह बात सामने आई है कि गाने सुनने से तनाव दूर होत है और गर्भावस्था की दिक्कतों से ध्यान हट जाता है। इससे पेट में पल रहे बच्चे में भी सुनने की क्षमता का विकास होता है। गर्भवती महिला को तनाव न होने पर प्रसव आसानी से हो जाता है।
स्पेशल डाइट : गर्भवती महिला को पोषक तत्वों से भरपूर भोजन करने की सलाह दी जाती है। अगर आप मानती है कि चूडि़यां पहनने से प्रसव आसानी से होगा, तो स्पेशल डाइट लेने से प्रसव में और ज्यादा आराम रहेगा। किसी भी रिवाज से ज्यादा हर गर्भवती स्त्री को इस बात का ज्यादा ख्याल रखना चाहिए।
घी का प्रयोग : भारतीय रिवाजों के अनुसार, जब सातवें महीने में महिला अपने मायके जाती है तो वह पति के घर से घी लेकर जाती है। इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण यह है कि घी के सेवन से महिला की मांसपेशियां मजबूत बनती है और इससे प्रसव में दर्द कम होता है और बच्चा प्राकृतिक रूप से ही पैदा हो जाता है, किसी प्रकार के ऑपरेशन की आवश्यकता सामान्य स्थितियों में नहीं होती है।
कार्यक्रम और उत्सव : गर्भावस्था के दौरान, महिला को अपने माता - पिता के द्वारा स्पेशल ट्रीटमेंट दिया जाता है, परिवारीजन और दोस्त सभी उसका विशेष ख्याल रखते हैं। इससे महिला को अच्छा लगता है और दिमाग रिलैक्स रहता है।



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