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क्या रिश्ते हमें पूरा करते हैं?
किसी भी रिश्ते में एक इंसान दूसरे इंसान से कुछ पाने की इच्छा रखता है। हम जो कुछ भी करते हैं, उससे हमें कुछ ना कुछ फायदे की उम्मीद होती है। अगर इसे दूसरी तरह से देखा जाए तो, हर इंसान कहीं ना कहीं और किसी ना किसी मामले में खुद को अधूरा पाता है। अपने नेचर के हिसाब से हमें पूर्ण होने की जरुरत होती है और हम खुद को पूरा करने के लिये किसी रिश्ते से जुड़ते हैं।
अब भले हम यह सोंच लें कि हमें कोई ऊपर से संचालित कर रहा हो या फिर कोई हमारे अदंर से आवाज दे रही हो, उससे पहले हम एक उत्तरजीवी हैं। हम पहले वही काम करते हैं जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करे और बाद में हम अपनी जरुरत को पूरा करते हैं। अंत में हम अपने आप को अपनी इच्छा को प्राप्त करने के लिये जोर देते हैं।
हम अपने रिश्तों को आवश्यकताओं के अनुसार 6 श्रेणियों में बांटते हैं:
- निजी- मुझे क्या चाहिये
- पारस्परिक - दोनों पर निर्भर
- सफलता - पेशेवर या व्यापार उन्मुख
- वैधानिक - देश के लिये क्या आवश्यक है
- सामाजिक - महत्व और कद
- आध्यात्मिक - सीमाओं और ग्रह का संरक्षण

इस लेख के लिये मैं पहली श्रेणी की बात करूंगा
ऐसा आखिरी बार कब हुआ कि आपने बैठ कर एक लिस्ट बनाई हो, जिसमें आप ने यह लिखा हो कि आपको अपनी जिंदगी में क्या चाहिये? क्या आपको प्यार, सम्मान, विश्वास, समर्थन, समझ, संचार, महत्व, निश्चितता, दिशा, ताकत, प्रसिद्धि, भाग्य, दोस्ती, लाड़ या फिर किसी और की आवश्यकता है? अपनी जरुरत के बारे में सोंचने भर से ही आप यह जान लेगें कि आपको किस तरह के रिश्ते की जरुरत है जो आपको पूरा कर सके। अपने पार्टनर को अच्छी तरह कैसे जानें
एक और तरीका है कि आप अपने वर्तमान संबन्धों को देखें और विश्लेषण करें कि अब आप दोनों उससे क्या पा रहे हैं। अभी हाल ही में मैंने एक महिला से बात की जिसकी शादी दो बार हो चुकी थी। उसकी पहली शादी इस लिये टूट गई क्योंकि दोनों में असामंजस्य था और अब दूसरी शादी भी टूटने के कगार पर है। उस महिला ने मुझसे सवाल किया कि क्या उसे इस शादी को ऐसे ही चलाए रखना है या फिर उसे अपने पति से तलाख लेने की बात करनी चाहिये?
मैनें उस महिला से पूछा की जब उसने पहली बार शादी की तो उसने वह शादी क्या सोंच कर की? उस महिला ने जवाब दिया कि, मुझे बस ऐसा महसूस हुआ कि अब मुझे शादी कर लेनी चाहिये। मैनें कई सालों तक काम किया और फिर मुझे लगा कि अब शादी करने का समय हो चुका है। हांला कि उस समय मुझे शादी करने की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही थी पर सामाजिक दबाव की वजह से मैनें यह कदम उठाया। पहली शादी के दम तोड़ देने की वजह से उसे लगा कि समस्या उसके अंदर नहीं है, बल्कि उसने यह सोंच कर फिर से दूसरी शादी कर ली कि वह इस काम में पूरी तरह से सक्षम है।
अब इस रिश्ते में महिला की यह समस्या है कि उसका पति उसके हिसाब से आदर्शवादी व्यक्ति नहीं है। महिला को लगता है कि उसका पति उसे प्यार नहीं करता, उसकी इज्जत नहीं करता और ना ही बोलता है। साथ ही वह उसकी वित्तीय जरूरतों को पूरा करता है। बल्कि वह उल्टा बोलता है कि अगर तुम्हे पैसे चाहिये तो तुम खुद जॉब करो या फिर अपने पेरेंट्स से पैसे मांगो। साथी पर भरोसा रखें, तो दिल रहेगा स्वस्थ
अब जो अहम सवाल उठता है- आखिर वह इस शादी में क्यूं फंसी हुई है? महिला ने जवाब दिया- "मुझे डर है कि लोग क्या कहेगें।" इस कहानी को पढ़ कर आपके मन में हजारो सवाद उमड़ रहे होंगे, और शायद आपको इस समस्या का जवाब भी पता होगा। पर दोस्तों, हमें उस हर समस्या का जवाब पता होता है, जो दूसरों की जिंदगी में घट रही होती है, लेकिन जब वही समस्या हमारी जिंदगी के साथ घट रही होती है, तो क्या फिर भी आपको उसका हल मिल जाता है?
यहां पर कुछ ऐसी बातें हैं जिससे आप खुद अपनी जिंदगी की जिम्मेदारी ले सकती हैं-
- अपनी जरुरतों को परिभाषित करें - प्यार, शक्ति, समझ, आदि
- अपने सभी मौजूदा रिश्तों की एक सूची बनाइये
- निर्धारित करें कि आप दोनों को उस संबन्ध से क्या मिल रहा है
- आप उस रिश्ते से और क्या पाना चाह रही हैं
- उस रिश्ते को सुरक्षित बनाने के लिये आप क्या प्रयास कर ही हैं
- उस रिश्ते को आप क्या दे रही हैं और खुद भी उससे क्या पा रही हैं, इन दोनो चीजों के बीच में क्या उचित संतुलन है?



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