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माता अंजनी थीं एक अप्सरा, जाने हनुमान जी जुड़े अनसुने फैक्ट
हमने अपने एक लेख में आपको राम भक्त हनुमान जी के तीन विवाह से जुड़े रहस्य के बारे में बताया था। आज हम आपको उनसे जुड़ी कुछ अन्य रोचक बातें बताएंगे जो वाकई में चौंका देने वाली हैं। आइए जानते हैं बजरंबली के वो रहस्य जिसे जानकर आप भी रह जाएंगे दंग।
कैसे हुआ बजरंबली का जन्म
कहते हैं बजरंबली को जन्म देने वाली उनकी माता अंजनि अपने पूर्व जन्म में देवराज इंद्र के दरबार में अप्सरा थीं जिसका नाम पुंजिकस्थला था। वे अत्यंत सुंदर और स्वभाव से चंचल थी। एक बार उन्होंने वन में एक वानर को तपस्या करते देखा, यह देख उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। पुंजिकस्थला ने उस तपस्वी वानर पर फल फेंकने शुरू कर दिए। इससे उस वानर की तपस्या भंग हो गई। दरअसल वह वानर नहीं बल्कि एक परम तेजस्वी साधू थे। क्रोधित होकर ऋषि ने पुंजिकस्थला को श्राप दे दिया कि वह अगले जन्म में वानरी बनेगी। यह सुनकर पुंजिकस्थला उन साधू से क्षमा मांगने लगी, तब साधू बोले कि तुम्हारा वानरी का रूप भी परम तेजस्वी होगा और तुम एक दिव्य बालक को जन्म दोगी जिसका नाम युगों युगों तक अमर रहेगा।

उस साधू के श्राप के कारण त्रेता युग में अंजनि को नारी वानर के रूप में धरती पर जन्म लेना पड़ा। एक बार जब इंद्र ने पुंजिकस्थला से मनचाहा वरदान मांगने को कहा, तब उसने देवराज को साधु के श्राप के बारे में बताया और कहा कि इंद्र उसे इस श्राप से मुक्ति दिलवा दें। इस पर इंद्र देव ने कहा कि इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए उसे धरती पर जाकर वास करना होगा, जहां वह अपने पति से मिलेंगी और शिव के अवतार को अपनी कोख से जन्म देंगी, तभी उन्हें इस श्राप से छुटकारा मिल पाएगा।
बाद में पुंजिकस्थला का जन्म अंजनि के रूप में धरती पर हुआ, वह एक शिकारन के तौर पर जीवन यापन करने लगीं। एक दिन उन्होंने जंगल में एक बड़े बलशाली युवक को शेर से लड़ते देखा और उसके प्रति आकर्षित हो गई। जैसे ही उस युवक ने उनकी ओर देखा उनका चेहरा वानरी में बदल गया, वह अपना चेहरा छिपकर ज़ोर ज़ोर से रोने लगीं। तब वह युवक उनके समीप आया और उनके रोने का कारण पूछने लगा तब अंजनि ने देखा उस युवक का चेहरा भी वानर की तरह ही था। वह युवक और कोई नहीं वनराज केसरी थे। अंजनि और केसरी ने वन में विवाह कर लिया किन्तु उन्हें संतान प्राप्ति नहीं हो रही थी, तब अंजनि मतंग ऋषि के पास अपनी समस्या का समाधान मांगने गईं। ऋषि ने उसे बताया कि बारह वर्ष तक तप एवं उपवास करने पर तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी।
कहा जाता है कि बारह वर्ष तक अंजनि केवल वायु पर ही जीवित रही, फिर एक दिन पवन देव ने आकर उन्हें वरदान दिया कि तुम एक बलशाली बालक की माता बनोगी यह सुनकर अंजनि बहुत प्रसन्न हुई। वह शिव जी का ध्यान करने लगी तब शिव जी ने प्रकट होकर उसे बताया कि वह उसके कोख से जन्म लेंगे, तब जाकर उसे उस श्राप से मुक्ति मिलेगी। कहा जाता है कि जब अयोध्या में राजा दशरथ पुत्र प्राप्ति के लिए महायज्ञ कर रहे थे, तब स्वयं अग्नि देव ने प्रकट होकर खीर से भरा कटोरा राजा को दिया था और कहा था कि इसे अपनी तीनों रानियों को खिला देना तुम्हे संतान की प्राप्ति अवश्य होगी। माना जाता है कि एक पक्षी उस खीर के पात्र में से थोड़ी सी खीर ले जाकर तपस्या कर रही अंजनि के पास गिरा आया अंजनि ने उसे शिव जी का प्रसाद समझकर ग्रहण कर लिया जिसके पश्चात उसने वानर मुख वाले हनुमान जी को पुत्र के रूप में जन्म दिया।
बजरंगबली के पांच भाई थे
कहा जाता है कि पांडु पुत्र भीम बजरंबली के ही भाई थे। वहीं ब्रह्मपुराण के अनुसार हनुमान जी के पांच भाई थे जिसमें यह सबसे बड़े थे अर्थात वानरराज केसरी के कुल छह पुत्र थे हनुमान, मतिमान, श्रुतिमान, केतुमान, गतिमान और धृतिमान।
हनुमान जी का पुत्र
हमने आपको बताया था कि किस तरह तीन तीन विवाह करने के पश्चात भी बजरंबली ने आजीवन ब्रह्चर्य का पालन किया था किन्तु फिर भी उनका एक पुत्र है जिसका नाम मकरध्वज था। मकरध्वज भी अपने पिता के सामान ही बहुत शक्तिशाली था। मकरध्वज की माँ एक मछली थी, कहते हैं जब सीता जी की खोज में हनुमान जी लंका पहुंचे तब उन्होंने चारों ओर उत्पात मचा दिया। उन्होंने पूरी की पूरी अशोक वाटिका ही उजाड़ दी थी। रावण ने क्रोधित होकर उनकी पूँछ जलाने का आदेश दे दिया तब हुनमान जी अपनी पूँछ की आग बुझाने के लिए समुद्र में गए। अग्नि के ताप के कारण उनके शरीर से पसीना निकल रहा था तभी उस पसीने की एक बूँद समुद्र में तैर रही एक मछली के मुख में चली गयी और वह गर्भवती हो गयी। कुछ समय बाद पाताल के राजा अहिरावण ने उस मछली को पकड़ लिया जब उसके पेट को चीरा गया तब उसमे से वानर मुख वाला एक बालक निकला।
जिसका नाम मकरध्वज रखा गया बाद में अहिरावण ने उसे पाताल लोक का द्वारपाल बना दिया। जब श्री राम और रावण के बीच युद्ध हो रहा था तब अहिरावण ने अपने भाई की मदद करने के लिए राम और लक्ष्मण को बंदी बना लिया था। जब हनुमान जी उन दोनों को आज़ाद करने पहुंचे तब उनकी मुलाकात मकरध्वज से हुई। हनुमान जी को इस बात का ज्ञान नहीं था की वह उनका पुत्र है। जब उन्होंने उससे उसका परिचय पूछा तब उसने बताया की वह हनुमान पुत्र मकरध्वज है, मकरध्वज ने उन्हें सारी बात बतायी। हनुमान जी मकरध्वज को द्वार से हटने के लिए कहते हैं किन्तु अपना फ़र्ज़ निभाते हुए वह पीछे हटने से इंकार कर देता है। पिता और पुत्र में भयंकर युद्ध होता है जिसमें हनुमान जी की जीत हो जाती है। बाद में हनुमान जी अहिरावण और महिरावण को भी युद्ध में पराजित कर देते हैं और श्री राम और लक्ष्मण को छुड़ा लेते हैं। अपने पुत्र मकरध्वज को आशीर्वाद प्रदान कर हनुमान जी उसे पाताल लोक का राजा बना देते हैं।



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