Google ने खास Doodle बनाकर विक्रम साराभाई को किया याद, भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के थे जनक

सर्च इंजन गूगल ने अपना डूडल भारतीय वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के 100 वीं वर्षगांठ के मौके पर समर्पित किया है।। भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान में इतनी तरक्की करके बड़े-बड़े अभियानों में जो सफलता प्राप्त की है उन सबका श्रेय केवल महान वैज्ञानिक विक्रम साराभाई को जाता है। मुंबई के डूडल आर्टिस्‍ट पवन राजुरकर ने ये विशेष डूडल बनाया है। आइए जानते हैं व‍िक्रम साराभाई के बारे में जिनके योगदान के बिना भारत कभी भी चंद्रयान-2 मिशन जैसे सफल प्रोजेक्‍ट की ओर आगे न बढ़ पाता।

 नजदीकी लोगों का था जीवन में प्रभाव

नजदीकी लोगों का था जीवन में प्रभाव

विक्रम अंबालाल साराभाई का जन्म अहमदाबाद में 12 अगस्त 1919 को हुआ था. उनके पिता अंबालाल साराभाई एक संपन्न उद्योगपति थे तथा गुजरात में कई फैक्‍ट्री के माल‍िक थे। उनकी पढ़ाई परिवार के बनाए एक ऐसे स्कूल में हुई थी जिसने विज्ञान की ओर उनकी जिज्ञासा और जानकारी को धार देने के लिए वर्कशॉप भी मौजूद थी। 18 साल की उम्र में वह पारिवारिक मित्र रबींद्रनाथ टैगोर की सिफारिश पर कैंब्रिज पहुंचे। कहते है क‍ि साराभाई बहुत सम्‍पन्‍न पर‍िवार से थे लेकिन अपने नजदीकियों की जिंदगी से सीखकर ही उन्‍होंने व‍िज्ञान, स्‍पेस प्रोग्राम का इस्‍तेमाल भारत के गरीब लोगों की मदद के ल‍िए करने का न‍िश्‍चय क‍िया।

सादगी भरा था जीवन

सादगी भरा था जीवन

दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत होने पर वह बंगलूरू के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएस) में नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. सीवी रमन के अंतर्गत शोध करने शुरु किए। आईआईएस में ही उनकी मुलाकात युवा वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा से हुई। यहीं वह क्लासिकल डांसर मृणालिनी स्वामिनाथन से भी मिले जिनसे उन्हें प्यार हो गया।

उन्होंने अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत तिरुवनंतपुरम के एक गांव थुंबा से की थी जहां न ही इन्फ्रास्ट्रक्चर था और न ही वहां बने ऑफिस में छत ही थी। वह अपने काम के अलावा अपने स्वभाव के लिए भी जाने जाते थे। ऐसा कहा जाता है कि दुनिया के खास लोगों के साथ बैठ चुके विक्रम को लैबोरेटरी में चप्पल पहने और सीटी बजाते हुए देखा जाता था।

 कैसे हुई इसरो की स्थापना

कैसे हुई इसरो की स्थापना

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन' (इसरो) की स्थापना विक्रम साराभाई की महान उपलब्धियों में एक थी। रूसी स्पुतनिक के लॉन्च के बाद उन्होंने भारत जैसे विकासशील देश के लिए अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व के बारे में सरकार को राजी किया और कहा देश को इसकी जरूरत है। डॉ. साराभाई ने अपने उद्धरण में अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व पर जोर दिया था।

आपको बता दें, इसरो और पीआरएल के अलावा, उन्होंने कई संस्थानों की स्थापना की. 'परमाणु ऊर्जा आयोग' के अध्यक्ष पद पर भी विक्रम साराभाई रह चुके थे। उन्होंने अहमदाबाद में स्थित अन्य उद्योगपतियों के साथ मिल कर 'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट', अहमदाबाद की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

 देख न सके आर्यभट्ट का परीक्षण

देख न सके आर्यभट्ट का परीक्षण

भारत ने 1975 में जब अपना पहला अंतरिक्ष उपग्रह ‘आर्यभट्ट' छोड़ा, तब पूरे देश में खुशी की लहर थी। देश को सबसे बड़ी खुशी देने के पीछे भी एक गम भी छ‍िपा हुआ था। आर्यभट्ट प्रोजेक्ट की परिकल्पना भारत के महान सपूत वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई ने की थी, लेकिन जब आर्यभट्ट का परीक्षण किया गया, तब इस विरल घटना को देखने का सौभाग्य साराभाई को नहीं मिला। अपने जीवन में उन्होंने आर्यभट्ट जैसे अनेक प्रोजेक्टों को कार्यान्वित किया, जिसका लाभ आज देश की जनता उठा रही है।

 डॉ विक्रम साराभाई द्वारा इन संस्थानों की स्थापना

डॉ विक्रम साराभाई द्वारा इन संस्थानों की स्थापना

भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल), अहमदाबाद

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट (आईआईएम), अहमदाबाद

कम्यूनिटी साइंस सेंटर, अहमदाबाद

दर्पण अकाडेमी फ़ॉर परफ़ार्मिंग आर्ट्स, अहमदाबाद

विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, तिरुवनंतपुरम

स्पेस अप्लीकेशन्स सेंटर, अहमदाबाद

फ़ास्टर ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफ़बीटीआर), कल्पकम

वेरिएबल एनर्जी साइक्लोट्रॉन प्रॉजेक्ट, कोलकाता

इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड(ईसीआईएल), हैदराबाद

यूरेनियम कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड(यूसीआईएल), जादूगुडा, बिहार

 ये पुरुस्‍कार मिलें

ये पुरुस्‍कार मिलें

भारत को अंतर‍िक्ष के क्षेत्र में कई सफलता द‍िलाने वाले महान वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई की मृत्यु 30 दिसंबर, 1971 को कोवलम, तिरुवनंतपुरम, केरल में हुई थी।

विक्रम साराभाई को 1962 में शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें 1966 में पद्म भूषण और 1972 में पद्म विभूषण (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया था।

Desktop Bottom Promotion