वामन द्वादशी: व्यावसायिक सफलता के लिए करें भगवान वामन की पूजा

Posted By: Rupa Shah
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चैत्र शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को वामन द्वादशी मनाई जाती है। कहतें है इस दिन श्री हरी विष्णु ने उत्तर प्रदेश के हरदोई ज़िले में वामन अवतार लिया था और इस एकादशी पर भगवान के इसी रूप की पूजा की जाती है। विष्णु जी के दस अवतारों में से वामन उनका एक अवतार है और ऐसी मान्यता है इनके इस रूप की आराधना करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

विष्णु जी के इस रूप को दक्षिण भारत में उपेन्द्र के नाम से भी जाना जाता है। आज यानि 20 मार्च को समस्त भक्तगण इस पवित्र व्रत को रखकर भगवान श्री हरी के इस अवतार की उपासना करेंगे। आइए जानते है क्या है इस व्रत से जुड़ी कथा, महत्व और विधि।

Vamana Dwadashi

व्रत कथा

पवित्र हिन्दू ग्रन्थ श्री भगवत पुराण के अनुसार जब राजा बलि ने अपने पराक्रम से समस्त देवताओं को पराजित कर दिया तो सभी देवता भय के कारण छिप कर रहने लगे। तब देवताओं की माता अदिति ने भगवान विष्णु की उपासना कर पयोव्रत रखा इसका अर्थ है बारह दिन उन्होंने केवल दूध पिया। उनकी भक्ति से श्री हरी अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्हें दर्शन दिया। भगवान ने माता अदिति को वरदान स्वरुप उनके पति ऋषि कश्यप द्वारा गर्भवती होने का आशीर्वाद दिया और उनसे ये भी कहा कि स्वयं भगवान विष्णु उन्हें पुत्र रूप में प्राप्त होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि श्री हरी ही उस बालक की रक्षा करेंगे। विष्णु जी ने अदिति से इस बात को किसी से भी न कहने के लिए कहा और अंर्तध्यान हो गए।

भगवान के आशीर्वाद से अदिति को पुत्र की प्राप्ति हुई। जिस समय भगवान नें जन्म लिया उस समय चंद्रमा श्रावण नक्षत्र में था और भाद्र मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी थी। उस समय को विजया द्वादशी भी कहतें है। विष्णु जी अदिति को अपनें वरदान की याद दिलानें के लिए उनके सामनें असली रुप में प्रकट हुए जो कि चार भुजाओं में से एक में शंख, दूसरें में चक्र, तीसरें में गदा और चौथी भुजा में कमल धारण किए हुए थे। कश्यप और अदिति को देखतें-देखतें भगवान नें वामन का अवतार धारण कर लिया। वामन अवतार में भगवान को यज्ञोपवीत, प्रथ्वी ने कृष्ण मृग का चर्म, चंद्रमा नंस दण्ड, माता अदिति नें कोपीन और कटि वस्त्र, ब्रह्मा जी नें कमण्डल, सप्त श्रृषि नें कुश, और सरस्वती नें रुद्राक्ष की माला धारण कराई और जगत जननी माता भगवती नें उनको भिक्षा दी। इसी कारण इस तिथि को वामन द्वादशी कहा जाता है।

वामन अवतार पिता से आज्ञा लेकर बलि के पास जाते हैं। उस समय राजा बलि नर्मदा के उत्तर-तट पर अन्तिम यज्ञ कर रहे होते हैं। वामन अवतार राजा बलि से भिक्षा में तीन पग भूमि मांगते हैं। बलि दैत्यगुरु शुक्राचार्य के मना करने पर भी अपने वचन पर अडिग रहते हुए, विष्णु को तीन पग भूमि दान देते हैं। भगवान एक पग में स्वर्ग व दूसरे पग में पृथ्वी को नाप लेते हैं। अब तीसरे पग हेतु राजा बलि अपना सिर भगवान के आगे कर देते हैं। वामन अवतार राजा बलि को पाताल लोक में साथ रहने का वचन देते हुए बलि का द्वारपाल बनना स्वीकार करते हैं। बाद में देवी लक्ष्मी विष्णु जी राजा बलि से वर माँग कर मुक्त करा लेती है।

वामन द्वादशी पूजा विधि

Vamana Dwadashi

इस दिन पूजा के लिए विशेष विधि है ।

सबसे पहले पूर्व की ओर हरे वस्त्र पर वामन देवता की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। फिर विधिवत दशोपचार पूजन करें। कांसे के दिए में शुद्ध देसी घी का दीप जलाएं, चंदन लगाएं, तुलसी पत्र चढ़ाएं, रक्त चंदन चढ़ाएं, मौसम्बी का फलहार चढ़ाएं, और मिश्री का भोग लगाएं।

तत्पश्चात रुद्राक्ष माला से इस विशेष मंत्र "ॐ तप रूपाय विद्महे श्रृष्टिकर्ताय धीमहि तन्नो वामन प्रचोदयात्" का 1 माला जाप करें।

इस पूजा का महत्व

ऐसी मान्यता है कि वामन द्वादशी पर पूजा करने से मनुष्य के सभी पापों का नाश हो जाता है। साथ ही इस पूजा से काम या व्यापार में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती है। इसके अलावा अगर आप भगवान वामन को अर्पित किया हुआ शहद का सेवन प्रतिदिन करेंगे तो आप हर रोग से मुक्त हो जाएंगे। परिवार में सुख शांति के लिए वामन देवता के समक्ष कांसे के दीये में घी का बारहमुखी दीपक जलाएं।

इस दिन चावल और दही सहित चांदी का दान करने का विशेष विधि-विधान है। इसके अलावा तांबा या उससे बनी कोई भी वस्तु भी आप दान कर सकते हैं।

English summary

Everything You Need To Know About Vamana Dwadashi And Lord Vamana

Vamana Dwadashi is observed on the 12th day of the Shukla Paksha in the month of Chaitra. It is believed that the fifth avatar of Lord Maha Vishnu was born on this day under the Shravan Nakshatra.
Story first published: Wednesday, March 28, 2018, 12:30 [IST]