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शिवजी ने नंदी बैल तो गणेश ने चूहे को क्यों चुना अपना वाहन
हमारे सभी देवी देवताओं के पास अपने अपने वाहन हैं और उनके हर वाहन का एक अपना अलग ही महत्व है। आपने गौर किया होगा कि ये सारे वाहन पक्षु पक्षी हैं और ये सभी कोई न कोई संदेश देते हैं। आइए जानते हैं भगवान से जुड़े इन पशु पक्षियों के बारे में।

मूषक
हमारे प्रथम पूजनीय श्री गणेश जो तर्क वितर्क करने और समस्याओं की जड़ तक जाकर उनका समाधान करने में सबसे आगे रहते हैं उनकी सवारी एक चूहा है जो उनके शरीर से बिल्कुल ही विपरीत है। गणेश जी के मूषक पर सवारी करने का अर्थ है उन्होंने स्वार्थ पर विजय पाई है।
एक कथा के अनुसार गजमुखासुर नामक एक असुर को वरदान प्राप्त था कि उसका वध किसी भी अस्त्र से नहीं हो सकता। तब गणेश जी ने उसका अंत करने के लिए अपना एक दांत तोड़कर उस पर वार कर दिया। भगवान के इस वार से भयभीत होकर वह असुर चूहा बनकर इधर उधर भागने लगा। गजानन ने उसे अपने पाश में बाँध लिया जिसके बाद वह भगवान से क्षमा याचना करने लगा। जिसके बाद गणेश जी ने उसे जीवनदान प्रदान कर अपना वाहन बना लिया।
गरुड़
भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ है गिद्धों की एक ऐसी प्रजाति जो अपनी बुद्धिमानी के लिए जानी जाती थी। इनका काम एक जगह से सन्देश दूसरी जगह पहुंचाना था। प्रजापति कश्यप और उनकी पत्नी विनता के दो पुत्रों गरुड़ और अरुण में से गरुड़ देव विष्णु जी के वाहन बन गए और अरुण देव सूर्य भगवान के पास चले गए। सम्पाती और जटायु अरुण के पुत्र थे।
ऐसी मान्यता है की जब रावण और जटायु का युद्ध हुआ था तब जटायु के शरीर के कुछ अंग दंडकारण्य में आकर गिरे था। दंडकारण्य में गिद्धराज जटायु का मंदिर है। कहते हैं सम्पाती और जटायु भी इसी क्षेत्र में रहते थे। मध्यप्रदेश के देवास जिले की तहसील बागली में 'जटाशंकर’ नाम का एक स्थान है कहा जाता है कि जटायु वहां तपस्या किया करते थे।
जटायु ने रावण से माता सीता को बचाने के लिए अपने प्राणो की आहुति दे दी थी। जटायु की मृत्यु दंडकारण्य में हुई थी।
उल्लू
एक कथा के अनुसार एक बार जब सभी देवी देवता धरती पर घूमने आये तो यूं ही उन्हें घूमता देख पशु पक्षियों को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा। सारे पशु पक्षी देवताओं के समीप पहुंचे और उनसे प्रार्थना करने लगी कि वे सभी उन्हीं में से किसी न किसी को अपना वाहन चुन लें। तब सभी देवी देवताओं ने अपना अपना वाहन चुनना आरम्भ कर दिया। जब लक्ष्मी जी की बारी आयी तो वे असमंजस में पड़ गई की किसे अपना वाहन बनाए क्यूंकि सभी पशु पक्षी उनका वाहन बनने के लिए आपस में लड़ रहे थे।
तब देवी लक्ष्मी ने उन्हें शांत करते हुए कहा कि कार्तिक अमावस्या के दिन वे पुनः धरती पर आएंगी और अपना वाहन चुनेंगी। सभी पशु पक्षी कार्तिक अमावस्या के दिन लक्ष्मी जी की राह देखने लगे। जब लक्ष्मी जी आयीं तब उल्लू ने अपनी तेज़ आंखों से अंधेरे में ही उन्हें देख लिया और फ़ौरन उनके पास चला गया। लक्ष्मी जी को भी अन्य जानवर वहां दिखयी नहीं दिए इसलिए वे उल्लू पर विराजमान हो गयीं।
उल्लू को सबसे बुद्धिमान पक्षी कहा जाता है। कहते हैं इसे भूत और भविष्य का ज्ञान पहले से ही हो जाता है। रात्रि में उड़ते समय न तो इसके पंख से आवाज़ निकलती है और न ही इसकी आंख झपकती है। इतना ही नहीं यह अपनी गर्दन को 170 अंश तक घुमा लेता है। माना जाता है इसके मुख से हु हु हु शब्द एक मंत्र है।
हंस
ज्ञान और कला की देवी सरस्वती सबसे साधारण देवी के रूप में जानी जाती हैं इसलिए माता सरस्वती के लिए हंस से बेहतर और कोई वाहन नहीं हो सकता था। हंस सबसे पवित्र और समझदार पक्षी माना जाता है। इसे प्रेम और एकता का प्रतीक माना जाता है। कहते हैं हंस अपना स्थान खुद ही चुनता है यह अन्य पक्षियों की अपेक्षा लंबी दूरी तय करता है।
बैल
प्राचीनकाल शिलाद नाम के एक ऋषि थे। उन्होंने कठोर तपस्या करके शिव जी को प्रसन्न किया और उनसे वरदान के रूप में एक पुत्र मांगा। शिव जी के आशीर्वाद से शिलाद को नंदी पुत्र के रूप में प्राप्त हुए। एक दिन ऋषि के आश्रम में दो दिव्य संत पधारे वरुण और मित्र। नंदी ने उन दोनों की खूब सेवा की जब वे दोनों संत जाने लगे तब उन्होंने शिलाद को लम्बी आयु और खुश रहने का आशीर्वाद दिया किन्तु नंदी को उन्होंने आशीर्वाद नहीं दिया। तब शिलाद ने उनसे पूछा कि उन्होंने उसके पुत्र को कोई आशीर्वाद क्यों नहीं दिया तब उन दोनों संतों ने बतया कि नंदी अल्पायु है। यह सुनकर शिलाद बहुत दुखी हो गए जब नंदी को इस बात का पता चला तो वे मुस्कुराए और अपने पिता से कहा कि वे स्वयं शिव जी का वरदान हैं तो उनकी रक्षा भी महादेव ही करेंगे। इतना कहकर नंदी भुवन नदी के तटपर तपस्या करने चले गए। उन्होंने अपनी तपस्या से भोलेनाथ को प्रसन्न किया और उनसे आशीर्वाद मांगा कि वह अपने पूरे जीवन उनकी सेवा करना चाहते हैं तब शिव जी ने नंदी को अपने गले से लगा लिया और उन्हें बैल का सिर देकर अपना वाहन बना लिया। इतना ही नहीं शंकर जी ने नंदी को वेदादि ज्ञान सहित अन्य ज्ञान भी प्रदान किये।
नंदी शिव जी के गणों में सर्वोत्तम माने जाते हैं। शिव का वाहन बैल है नंदी। जिस प्रकार गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है उसी प्रकार बैलों में नंदी श्रेष्ठ है। बैल का चरित्र उत्तम और समर्पण भाव वाला बताया गया है। इसके अलावा वह बल और शक्ति का भी प्रतीक है। किन्तु जब इसे क्रोध आता है तो उससे बचना मुश्किल हो जाता है। कहते हैं शिवजी का चरित्र भी बैल समान ही है इसलिए उन्होंने इसे अपना वाहन चुना था।
बाघ
माता पार्वती का वाहन बाघ है यह बल और शक्ति का प्रतीक है। एक कथा के अनुसार एक बार शिव जी ने मज़ाक में माता पार्वती को काली कह दिया था। यह बात उन्हें बहुत बुरी लगी और वह कैलाश छोड़कर वन में तपस्या करने चली गयीं। जब माता ध्यान में लीन थी तब वहां पर एक भूखा बाघ आया किन्तु माता को देखकर वह बाघ वहीं उनके समीप बैठ गया। माता की यह ज़िद थी कि जब तक वह गोरी नहीं हो जाती वह तपस्या में ही लीन रहेंगी। कहते हैं जितने वर्षों तक माता ने तपस्या की वह बाघ उनके पास ही बैठा रहा। अंत में शिव जी प्रकट हुए और उन्होंने माता पार्वती को गोरा होने का आशीर्वाद दिया, तब जाकर माता की तपस्या खत्म हुई इसके बाद देवी पार्वती नदी में स्नान करने गयी। तभी उन्हें वहां बैठा बाघ दिखाई दिया जब उन्हें इस बात का पता चला कि वह भी उनके साथ इतने वर्षों तक यहीं बैठा रहा तब माता ने प्रसन्न होकर उसे अपना वाहन बना लिया।
मोर
मोर भगवान कार्तिकेय का वाहन है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने कार्तिकेय की सादक क्षमता को देखकर उन्हें भेंट स्वरुप मयूर दिया था। दक्षिण भारत में कार्तिकेय को इनका वाहन मोर होने की वजह से मुरुगन भी कहा जाता है। इनकी पूजा वहां अधिक होती है। कार्तिकेय भगवान शिव के ज्येष्ठ पुत्र हैं।



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