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उत्तराखंड के इस गांव में मौजूद है कर्ण और दुर्योधन का मंदिर, यहां के लोगों का है महाभारत से नाता
उत्तराखंड को देवभूमि भी कहा जाता है। यहां हर कदम पर मंदिरों की भरमार है। यहां भूमियां देवता से लेकर ग्वेल देवता, ग्राम देवता और कुल देवताओं की भी मान्यता है। लेकिन इसकी खूबसूरत वादियों में कई ऐसे अनोखे मंदिर भी है, जो कि महाभारत के पात्रों से जुड़े हुए है। इस धरती पर महाभारत के 'खलनायक' दुर्योधन और दानवीर कर्ण की भी पूजा होती है। जी हां, उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के जखोल में टंस घाटी में दुर्योधन और कर्ण के मंदिर है। दुर्योधन का मंदिर यहां के नेतवार नामक जगह से करीब 12 किमी दूर 'हर की दून' रोड पर स्थित सौर गांव में है. देहरादून से करीब 95 किमी दूर चकराता और चकराता से करीब 69 किमी दूर नेतवार गांव है. जबकि कर्ण मंदिर नेतवार से करीब डेढ़ मील दूर सारनौल गांव में है।

यहां है दुर्योधन का मंदिर
ये देश का एक मात्र मंदिर है जो कौरवो के सबसे बड़े भाई दुर्योधन को समर्पित है। स्थानीय इतिहासकारों का कहना है कि मंदिर के देवता दुर्योधन है लेकिन यहां के लोग इसे कौरव मंदिर मानने से स्वीकार नहीं करते हैं। दुर्योधन के मंदिर को कुछ साल पहले शिव मंदिर में तब्दील कर दिया गया लेकिन इस गांव में अभी भी सोने की परत चढ़ी एक कुल्हाड़ी है जिसे लोग कौरव राजकुमार दुर्योधन की मानते हैं।

बू़ढ़ी गंगा के पास है कर्ण मंदिर
आज का कर्ण मंदिर बूढ़ी गंगा के पुल के पास स्थित है। माना जाता है कि, महाभारत काल मे गंगाजी, इसी घाट से होकर गुजरती थीं। गंगा जी का प्रवाह इस स्थान से दूर हो जाने की वजह से, अब इस विलुप्त धारा को बूढ़ी गंगाजी के नाम से जाना जाने लगा है। कर्ण घाट से थोड़ा ही दूर, द्रौपदी घाट को बूढ़ी गंगा पुल के विपरीत दिशा मे देखा जा सकता है।

कर्ण मंदिर
कर्ण घाट मंदिर पर सूर्यपुत्र दानवीर कर्ण भगवान शिव की पूजा करने के पश्चात, सवामन सोना प्रतिदिन दान किया करते थे। मान्यता के अनुसार, उसी स्थान 2012 की दीपावली को शिवलिंग की पुनः स्थापना कर दी गयी है। ऐसा माना जाता है कि पास ही मे एक देवी माँ का मंदिर था। जो कर्ण को सोना दिया करतीं थीं, आज वो मंदिर विलुप्त हो चुका है या धरती मे समा गया है।

ऐसे बना यहां मंदिर
सारनौल और सौर गांव की यह भूमि भुब्रूवाहन नाम के एक महान योद्धा की धरती है। मान्यता है कि पाताललोक का राजा भुब्रूवाहन द्वापरयुग में कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत युद्ध का हिस्सा बनना चाहता था। मन में यही चाहत लिए वह धरती पर आया, लेकिन भगवान कृष्ण ने बड़ी ही चालाकी से उसे युद्ध से दूर कर दिया।
भुब्रूवाहन कौरवों की तरफ से युद्ध में शामिल होना चाहता था और कृष्ण को अंदेशा था कि भुब्रूवाहन अर्जुन को चुनौती दे सकता है। इसलिए उन्होंने भुब्रूवाहन को एक चुनौती दी।
कृष्ण ने भुब्रूवाहन को एक ही तीर से एक पेड़ के सभी पत्तों को छेदने की चुनौती दी, इस बीच कृष्ण ने एक पत्ता तोड़कर अपने पैर के नीचे दबा लिया। भुब्रूवाहन का तीर पेड़ पर मौजूद सभी पत्तों को छेदने के बाद कृष्ण के पैर की तरफ बढ़ रहा था, तभी उन्होंने अपना पैर हटा लिया। कृष्ण किसी भी तरह भुब्रूवाहन को युद्ध से दूर रखना चाहते थे और उन्होंने उसे निष्पक्ष रहने को कहा। निष्पक्ष रहने का अर्थ युद्ध से दूर रहना था और महाभारत के युद्ध से दूर रहना किसी भी योद्धा को मंजूर नहीं होता, इसलिए कृष्ण ने भुब्रूवाहन से पार पाने का रास्ता निकाल लिया। उन्होंने किसी तरह भुब्रूवाहन का सिर उसके धड़ से अलग कर दिया।
हालांकि कृष्ण ने युद्ध शुरू होने से पहले ही भुब्रूवाहन का सिर धड़ से अलग कर दिया, लेकिन उसने युद्ध देखने की इच्छा जाहिर की और भगवान कृष्ण ने उसकी इच्छा पूरी की। उन्होंने भुब्रूवाहन के सिर को यहां एक पेड़ पर टांग दिया और उसने यहीं से महाभारत का पूरा युद्ध देखा। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब-जब भी महाभारत के युद्ध में कौरवों की रणनीति विफल होती, जब-जब भी उन्हें हार का मुंह देखना पड़ता, तब भुब्रूवाहन जोर-जोर से चिल्लाकर उनसे रणनीति बदलने के लिए कहता था। वो रोता था और आज भी रो रहा है।
मान्यता तो ये भी है कि भुब्रूवाहन के इन्हीं आंसूओं से यहां तमस या टोंस नाम की नदी बनी है। यही कारण है कि आज भी इस नदी का पानी कोई नहीं पीता। दुर्योधन और कर्ण दोनों भुब्रूवाहन के बड़े प्रशंसक थे। यहां के स्थानीय लोग अब भी उसकी वीरता को सलाम करते हैं और उसकी प्रशंसा में गीत गाए जाते हैं। यहां के लोगों ने भुब्रूवाहन के मित्र कर्ण और दुर्योधन के मंदिर बनाए हैं। दुर्योधन का मंदिर सौर गांव में, जबकि कर्ण का मंदिर सारनौल गांव में हैं, यही नहीं ये दोनों इस इलाके के क्षेत्रपाल भी बन गए।



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