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गर्भावस्था के दौरान अल्ट्रासाउंड के बारे में जाने कुछ खास बातें
गर्भावस्था के दौरान समय-समय कई टेस्ट और फॉलोअप चेकअप करवाने पड़ते है जो मां और गर्भ में पलने वाले बच्चे के स्वास्थ्य को जानने के लिए किए जाते है। इन्ही टेस्ट में से एक टेस्ट अल्ट्रासाउंड या स्कैन होता है जो फीमेल की डिलीवरी करने से पहले किया जाता है। इस परीक्षण से भ्रूण में पलने वाले बच्चे को किसी भी प्रकार की समस्या या असमानता का पता लगाया जाता है। प्रेगनेंसी के दौरान अल्ट्रासाउंड स्कैन का क्या प्रयोग?
साथ ही साथ बच्चे का विकास भी देखा जाता है। पूरी गर्भावस्था के दौरान अधिकतम चार बार अल्ट्रासांउड करवाया जा सकता है। इस टेस्ट में पेट में पलने वाले बच्चे को एक स्क्रीन के माध्यम से देखा जा सकता है। लेकिन वर्तमान में कई बार अल्ट्रासांउड का गलत उपयोग भी किया जाता है। इसे ज्यादा करने से बच्चे को भी समस्या हो सकती है।

गर्भावस्था के दौरान अल्ट्रासाउंड का महत्व :
गर्भावस्था के दौरान अल्ट्रासाउंड परीक्षण भ्रूण में पलने वाले बच्चे के स्वास्थ्य और स्थिति के बारे में स्पष्ट जानकारी देता है। गर्भावस्था के दौरान निम्मलिखित अल्ट्रासाउंड स्कैन्स करवाने चाहिये
विएबिलिटी स्कैन : इस प्रकार के स्कैन को 6 वें और 10 वें सप्ताह में करवाना चाहिये, इससे बच्चे के दिल की धड़कन, गर्भ में बच्चे की संख्या आदि का पता चलता है।
नूचल ट्रांसल्यूसेंसी स्कैन : इस स्कैन को गर्भावस्था के 12 वें सप्ताह में किया जाता है, जिसमें बच्चे के विकास और उसे होने वाली समस्याओं का पता लगाया जाता है। इसे करने से प्रसव करने का तरीका भी पता लग जाता है। अगर बच्चे की स्थिति सही नहीं होती है तो ऑपरेशन आदि करने के बारे में भी डॉक्टर अंदाजन बता सकते है।
एनोमाली स्कैन : इस प्रकार के स्कैन को गर्भावस्था के 18 वें और 20 वें सप्ताह में किया जाता है। इसे करने से भ्रूण की शरीर में स्थिति, नाल की स्थिति पता चल जाती है। इसे करने से एक आईडिया लग जाता है कि बच्चे का दिमाग, चेहरा, रीढ़ की हड्डी, पेट, किड़नी आदि का विकास किस प्रकार हो रहा है। इसे करने से अमीनोटिक फ्लूड दिए जाने की मात्रा का भी पता चलता है और बच्चे के विकास की सही स्थिति पता चलती है।
फेटल इकोकार्डियोग्राफी : इस टेस्ट को करने से भ्रूण के दिल की धड़कन का सही पता चल जाता है। इसे गर्भावस्था के 20 वें और 22 वें सप्ताह में किया जाता है। अगर गर्भ में पलने वाले बच्चे के हार्टरेट को लेकर कुछ आशंका होती है तो इस टेस्ट को किया जाता है।
फेटल वेलबिंग : इस स्कैन को 28 से 39 वें सप्ताह में किया जाता है। इसमें बच्चे की सही स्थिति का पता लगाया जाता है।
गर्भावस्था के दौरान अल्ट्रासाउंड स्कैन को कैसे किया जाता है
गर्भावस्था के सभी चरणों में अल्ट्रासाउंड के अलग-अलग स्कैन को जरूरत के अनुसार डॉक्टर करते है। लेकिन शुरूआती महीनों में ट्रांसवैजिनल सोनोग्राफी की आवश्यकता पड़ती है।
ट्रासंएब्डोमिनल अल्ट्रासाउंड : इस प्रकार के अल्ट्रासाउंड में सोनोलॉजिस्ट, पेट पर जेल की तरह का सब्सटेन्स लगा देते है और हाथ से चलाए जाने वाले ट्रांसड्यूसर को पेट पर फिराते है और भ्रूण की स्थिति का पता लगाते है। इससे बच्चे की गतिशीलता का पता चलता है। इस परीक्षण के दौरान गर्भवती महिला भी बच्चे को स्क्रीन या मॉनीटर पर आसानी से लेटे-लेटे देख सकती है। इस प्रकार की सोनोग्राफी सुरक्षित होती है और इससे महिला को ज्यादा समस्या भी नहीं होती है।
ट्रांसवैजिनल अल्ट्रासाउंड : इस प्रकार के अल्ट्रासाउंड में सोनोलॉजिस्ट वेजिना में एक पतली सी ट्रासंड्यूसर घुसा देते है। इस पर कंडोम लगाकर घुसाया जाता है ताकि आसानी से अंदर चला जाएं। इससे ज्यादा तकलीफ नहीं होती है और अंदर का व्यू काफी साफ दिखाई देता है।
सोनोग्राफी के लिए कैसे तैयार हों :
1) हल्के और ढीले कपड़े पहनें ताकि पेट आसानी से खोला जा सके और पूरा टेस्ट आसानी से किया जा सके।
2) पर्याप्त मात्रा बल्कि ज्यादा मात्रा में पानी पिएं। इससे यूट्रस बाहर की ओर निकल आता है और भ्रूण का अच्छा दृश्य देखने को मिलता है।
3) ट्रासंवेजिनल अल्ट्रासांउड के लिए आप अपने डॉक्टर से खुलकर बात करें और रिर्जव करवाएं। अपने आपको रिलैक्स रखें, अपनी लोअर बॉडी को रिलैक्स रखें, हो सकता है कि थोड़ा सा दर्द हो, लेकिन बर्दाश्त करें। गहरी सांस लें, हिम्मत रखें और ज्यादा दर्द होने पर डॉक्टर को बताएं।



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